ग्राउंड रिपोर्ट | प्रदूषण की मार से जूझता सोनभद्र–सिंगरौली, एम्स भोपाल की रिपोर्ट ने खोली गंभीर सच्चाई

म्योरपुर (सोनभद्र) | संवाददाता – Prashant Dubey, सोन प्रभात न्यूज़

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में औद्योगिक प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर संकट बन चुका है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भोपाल द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन ने इस भयावह स्थिति को उजागर कर दिया है। यह अध्ययन उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वित्त पोषण से नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच किया गया, जिसमें प्रदूषण और उससे जुड़ी बीमारियों के बीच सीधे संबंध की पुष्टि हुई है।

शोध में चौंकाने वाले तथ्य

अध्ययन के तहत—

  • सोनभद्र को प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र (Exposed Group)
  • जबकि वाराणसी को नियंत्रण क्षेत्र (Control Group) के रूप में चुना गया

 कुल 1097 प्रतिभागियों (सोनभद्र – 513, वाराणसी – 584) पर अध्ययन किया गया।

रिपोर्ट में सामने आया कि—

  • टीपीपी (Thermal Power Plants) और उद्योगों के 10 किमी दायरे में रहने वाले लोगों में
     अस्थमा, क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं
  • सोनभद्र के 100% घरों में काली धूल और नमी की समस्या पाई गई
  • सिंगरौली क्षेत्र में बच्चों और वयस्कों में
     त्वचा रोग, पेट की समस्याएं और अन्य दीर्घकालिक बीमारियां अधिक हैं


 फ्लाई ऐश और जहरीली धातुएं बनीं खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार—
 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश
 और उसमें मौजूद भारी धातुएं (Heavy Metals)

इन बीमारियों का प्रमुख कारण हैं।

शोध में वायु गुणवत्ता (PM स्तर) और जल नमूनों की जांच में भी
प्रदूषण के अत्यधिक स्तर की पुष्टि हुई।

लंबे समय तक ऐसे वातावरण में रहने से—

  • प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है
  • और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है


 नियमों की अनदेखी पर बड़ा सवाल

रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि—
सोनभद्र जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में पर्यावरणीय नियमों का पालन कमजोर है

वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि—

  • फ्लाई ऐश का बेहतर प्रबंधन
  • निरंतर मॉनिटरिंग
  • और सख्त नीति लागू करना बेहद जरूरी है

 एनजीटी में गूंजा मुद्दा, जनहित याचिका पर सुनवाई

सिंगरौली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सिंगरौली प्रदूषण मुक्ति वाहिनी द्वारा दायर जनहित याचिका पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण में सुनवाई जारी है।

संयोजक रामेश्वर प्रसाद और वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता जगतनारायण विश्वकर्मा ने कहा—

“एम्स भोपाल की रिपोर्ट कंपनियों की मनमानी और प्रदूषण की सच्चाई उजागर करती है।”

उन्होंने आम लोगों से स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने और प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है।


 रिहंद जलाशय तक पहुंच रहा जहरीला पानी

पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि—

  • कोल माइंस से निकलने वाला प्रदूषित पानी बलियानाला के जरिए रिहंद जलाशय में पहुंच रहा है
  • यह पानी और मछलियां स्थानीय लोग उपयोग करते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है

इसके अलावा—

  • म्योरपुर ब्लॉक के चिलकाडांड, निमियाडाड़ और खड़िया क्षेत्र में
     ओबी (Overburden) डंप से उड़ने वाली धूल लोगों की जिंदगी मुश्किल बना रही है
  • सिंगरौली क्षेत्र का AQI भी बेहद खराब स्तर पर है

 वहीं, बिजली संयंत्रों में सल्फर ऑक्साइड नियंत्रण के लिए जरूरी FGD (Flue Gas Desulfurization) 2024 तक लगना था,
लेकिन अब तक कई जगह लागू नहीं हुआ है।


प्रशासन सक्रिय, उद्योगों को नोटिस

एम्स भोपाल की रिपोर्ट के बाद सोनभद्र के जिलाधिकारी ने—
संबंधित उद्योगों को सुधार के निर्देश जारी किए हैं

आर के सिंह (क्षेत्रीय अधिकारी, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) ने बताया—

“बोर्ड इस मामले में कड़ी निगरानी कर रहा है और आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।”


 सोन प्रभात विश्लेषण

यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि
सोनभद्र और सिंगरौली की जमीनी सच्चाई का आईना है

जहां एक तरफ देश को ऊर्जा मिल रही है,
वहीं दूसरी तरफ—
स्थानीय लोग अपनी सेहत और जीवन की कीमत चुका रहे हैं

अब सबसे बड़ा सवाल—
 क्या विकास और स्वास्थ्य के बीच संतुलन बन पाएगा?

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