सोनभद्र की झिरगाडंडी पहाड़ियों में मिलीं ढाई अरब वर्ष पुरानी ग्रेनाइट चट्टानें।

  • 0 से लो–टू–मीडियम ग्रेड रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है क्षेत्र, लैब में होगी नमूनों की विस्तृत जांच।
  • सोनभद्र की झिरगाडंडी पहाड़ियों में मिलीं ढाई अरब वर्ष पुरानी ग्रेनाइट चट्टानें।
  • लखनऊ विश्वविद्यालय के शोध में बड़ा खुलासा, छत्तीसगढ़ से जुड़ी भूवैज्ञानिक कड़ी उजागर

म्योरपुर/सोनभद्र। आशीष गुप्ता / प्रशांत दुबे / सोन प्रभात

भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सोनभद्र जिले में पृथ्वी के प्रारंभिक विकास काल से जुड़ी ढाई अरब वर्ष पुरानी चट्टानों की पुष्टि हुई है। यह चट्टानें सोनभद्र के चोपन ब्लाक अंतर्गत झिरगाडंडी क्षेत्र की पहाड़ियों में पाई गई हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के शोध छात्रों द्वारा किए गए अध्ययन में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि सोनभद्र और छत्तीसगढ़ (रामानुजगंज क्षेत्र) की चट्टानों में उल्लेखनीय समानता है।

इस शोध का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ भूवैज्ञानिक प्रोफेसर विभूति राय ने बताया कि झिरगाडंडी क्षेत्र की चट्टानें सोन वैली क्षेत्र की अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन चट्टानों में शामिल हैं, जिनकी आयु लगभग ढाई अरब वर्ष (2.5 बिलियन ईयर) आंकी गई है। ये चट्टानें सिंहभूम–अरावली भू-प्रांत की चट्टानों से मेल खाती हैं, जो भारत के सबसे पुराने भूगर्भीय ढांचों में गिनी जाती हैं।

धरती की हलचलों के बावजूद सुरक्षित है मूल चट्टानी आधार

 

प्रो. राय के अनुसार, इतने लंबे भूगर्भीय काल में पृथ्वी की सतह पर कई बार जबरदस्त हलचलें हुईं। इस दौरान चट्टानों में मोड़, दरारें और रूपांतरण (मेटामॉर्फिज़्म) की प्रक्रियाएं चलीं, लेकिन इसके बावजूद झिरगाडंडी क्षेत्र का मूल चट्टानी आधार आज भी संरक्षित है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज और सोनभद्र के झिरगाडंडी की चट्टानों में संरचनात्मक बनावट और खनिजीय लक्षणों की स्पष्ट समानता देखी जा रही है।

आर्कियन से प्रारंभिक प्रोटेरोज़ोइक काल की विरासत

भूवैज्ञानिकों के अनुसार, ये चट्टानें आर्कियन और प्रारंभिक प्रोटेरोज़ोइक काल में बनी थीं, जब पृथ्वी की सतह धीरे-धीरे स्थिर होना शुरू हुई थी। उस काल में ग्रेनाइट, गनीस, क्वार्टजाइट जैसी क्रिस्टलाइन चट्टानों का निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ। झिरगाडंडी क्षेत्र में भी लो–टू–मीडियम ग्रेड रूपांतरित चट्टानें, क्वार्टजाइट और गनीसिक संरचनाएं प्रमुख रूप से देखी जा रही हैं, जो इस प्राचीन भूवैज्ञानिक इतिहास की पुष्टि करती हैं।

खनिज, पर्यावरण और भूमि उपयोग के लिए अहम खोज

विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि खनिज संसाधन, पर्यावरणीय अध्ययन और भूमि उपयोग नियोजन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इतने पुराने भू-खंडों में कई बार बहुमूल्य खनिजों की संभावनाएं पाई जाती हैं, वहीं इनके संरक्षण से पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

प्राचीन धरती की कहानी बयां करती हैं ये चट्टानें

प्रो. विभूति राय का कहना है कि भले ही सोनभद्र और छत्तीसगढ़ दो अलग-अलग राज्यों में स्थित हों, लेकिन भूवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों क्षेत्रों की चट्टानें एक ही प्राचीन धरती की कहानी कहती हैं। ये चट्टानें पृथ्वी के प्रारंभिक विकास काल की साक्षी हैं और हमें यह समझने में मदद करती हैं कि करोड़ों-करोड़ साल पहले धरती की संरचना कैसी थी।

पांच साल पहले शुरू हुआ था अध्ययन

विंध्य वैली क्षेत्र में प्राचीन चट्टानों की तलाश और अध्ययन का कार्य करीब पांच वर्ष पहले शुरू किया गया था। प्रो. विभूति राय ने सोनभद्र के ओबरा, बिल्ली–मारकुंडी, जोगिया पहाड़ी, झिरगाडंडी समेत कई क्षेत्रों में स्थलीय सर्वे किया। इस दौरान चट्टानों और पत्थरों के नमूने एकत्र कर उन्हें प्रयोगशाला में भेजा गया। लंबी जांच, पेट्रोग्राफिक अध्ययन और अन्य वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद यह पुष्टि हुई कि यहां पाई गई ग्रेनाइट चट्टानें लगभग ढाई अरब वर्ष पुरानी हैं।

 “सोनभद्र के झिरगाडंडी में मिली चट्टानें ढाई अरब वर्ष पुरानी हैं। यहां की चट्टानें सिंहभूम–अरावली की चट्टानों से मेल खाती हैं। दोनों इलाकों की चट्टानें एक ही प्राचीन धरती की कहानी बयां करती हैं, जो पृथ्वी के प्रारंभिक विकास काल से जुड़ी हैं।”

— प्रो. विभूति राय, भूवैज्ञानिक

यह खोज सोनभद्र को देश के महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक स्थलों की सूची में और मजबूती से स्थापित करती है तथा आने वाले समय में इस क्षेत्र पर और गहन शोध की संभावनाओं के द्वार खोलती है।

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