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रामचरितमानस–: ” सिरधरि आपसु करिय तुम्हारा, परम धरमु यह नाथ हमारा।” – मति अनुरुप– जयन्त प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख) 

– जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य – राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

 

श्री रामचरितमानस में अनेको स्थान और प्रसंग में धर्म की प्रत्यक्ष चर्चा हुई है व अनेकों प्रकार के आचरण को धर्म सम्मत आचरण कहा गया है।  जैसे– ” परहित सरिस धर्म नहिं भाई।” अर्थात परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है।

 

फिर–  “एहि ते अधिक धरम नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा  अर्थात सास ससुर की सेवा से बड़ा कोई दूसरा धर्म नहीं है।  करेहु सदा संकर पद पूजा। नारि धरम पति देउ न दूजा ”  आदि अनेक।

इस प्रकार स्थान– स्थान पर पिता का धर्म, पुत्र का धर्म, पत्नी का धर्म, पति का धर्म, मित्र का धर्म आदि क्या है, इस पर प्रकाश डाला गया है। इनके अतिरिक्त रामचरितमानस में उल्लेख किया गया “परम धर्म” की।इस अंक में हम उसी की चर्चा करेंगे, यथा–

“सिरधरि  आपसु करिय तुम्हारा, परम धरमु यह नाथ हमारा।”

अर्थात आपकी आज्ञा शिरोधार्य करना हमारा परम धर्म है।  यह चौपाई अक्षरश: मानस में दो बार आयी है, प्रथमत: बालकांड में ७६ वें  दोहा के बाद और दूसरी बार अयोध्या कांड में २१२ वें  दोहा के बाद।

           किसी पंक्ति को अक्षरश: दुहराने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?  क्या ‘चारों वेद पुरान अष्टदस छवो सास्त्र सब ग्रंथन को रस’  इस ग्रंथ में समेट सकने वाले गोस्वामी जी को शब्दों की कमी पड़ गई?  ऐसा नहीं माना जा सकता।  इसमें कुछ रहस्य छिपा हो सकता है, अपनी मति के अनुरूप विचार प्रस्तुत है–

यह चौपाई प्रथम बार तब आया है, जब श्री राम प्रकट होकर शिवजी से पार्वती के साथ विवाह के लिए अनुरोध करते हैं–

अब विनती मम सुनहु सिव, जो मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु  सैलजहिं, यह मोहि मांगे देहु।

इसके उत्तर में शिवजी कहते हैं–

“सिर धरि आयसु करिय तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।।”

अभिप्राय यह है, कि हे नाथ! मुझ बैरागी के लिए तो विवाह न करना ही धर्म था परंतु स्वामी की आज्ञा पालन करते हुए विवाह करना ही मेरा परम धर्म है।

अब यही चौपाई पुनः उस प्रसंग में आयी है, जब महर्षि भारद्वाज जी के आज्ञा देने पर भरत जी को उनका आतिथ्य स्वीकार करना पड़ा, उस समय भरत कठिन संकोच में पड़ गये–

“भयउ कुअवसर कठिन संकोचू “

परंतु पुनः–
जानि गरूइ गुर गिरा बहोरी। चरण बन्दि बोले कर जोरी।।
सिर धरि आयसु करिय तुम्हारा।परम धरमु यह नाथ हमारा।।

अर्थात हे मुनि आप जैसे विरक्त का भोजनादि आतिथ्य और सेवा ग्रहण न करना (वह भी ऐसे समय में जब भरत कठिन व्रत के साथ राम को मनाने जा रहे है और भोजनादि का त्याग कर दिया है)  ही धर्म था पर आपकी आज्ञा शिरोधार्य कर आपका आतिथ्य स्वीकार करना मेरा परम धर्म है।

इस पंक्ति को पहले शिवजी के द्वारा और फिर भरत जी के द्वारा पुनरुक्ति करके गोस्वामी जी यह कहना चाहते हैं, कि संत और भगवंत की आज्ञा का पालन करना गृहस्थ और विरक्त दोनों के लिए परम धर्म है।  यह सिद्धांत अटल और अक्षरश: प्रमाणित है, सत्य है,  इसमें एक भी मात्रा घटाने बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है।

–जय जय श्री राम– 

– जयन्त प्रसाद 

  • प्रिय पाठक!  रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंग से जुड़े लेख प्रत्येक शनिवार प्रकाशित होंगे। लेख से सम्बंधित आपके विचार व्हाट्सप न0 लेखक- 9936127657, प्रकाशक-  8953253637 पर आमंत्रित हैं।

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Ashish Kumar Gupta

Ashish Kumar Gupta is an Indian news anchor and journalist, who is the managing director and editor-in-chief of Son Prabhat Web News Service Private Limited Sonbhadra India. In the field of journalism, this journalist, who constantly talks about social interest and public welfare with his pen, is establishing a new dimension in the journalism of the district. Email - Editor@sonprabhat.live

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