मुख्य समाचारसम्पादकीय

बेटी दिवस पर बेटियों का दर्द….. हम बेटियां हैं, हमारा घर कहां है?

सम्पादकीय लेख :- सर्वेश कुमार गुप्त “प्रखर” – सोनप्रभात 

कल बेटी दिवस मनाया जा रहा था, सोशल मीडिया पर इस की धूम मची हुई थी, बेटी दिवस सितंबर माह के चौथे रविवार को मनाया जाता है। लेकिन मेरे सोच औऱ विचार से बेटी दिवस का महत्व अभी भी सार्थक नहीं है ,जब तक कि पूरे देश में बेटियों को पूरी तरह सुरक्षा मुहैया नहीं हो जाता तब तक कुछ भी सार्थक कहा ही नही जा सकता है, बेटियों का दर्द कौन सुनेगा? कहने को तो सभी लोग टेलीविजन पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि बेटियों के लिए कोई कुछ नहीं कर पाता ।

बेटियों के कुछ ही दर्द को आज मैं आप सभी लोगों के सामने रखने का प्रयास करना चाहता हूं ,सर्वप्रथम तो बेटियों को इस पृथ्वी पर आने से पूर्व ही मार दिया जाता है ,अगर बच भी जाती है तो उसे उपेक्षा भरी नजरों से देखा जाता है ,बेटी का तो जन्म लेना जैसे कोई अभिशाप हो जाना माना जाता है ,एक बेटी के जन्म पर इतनी खुशी नहीं होती जितना एक बेटा के जन्म पर होता है, बेटियों को हर समय यह एहसास भी दिलाया जाता है कि वह पराई है ,आज मां, बाप के पास है, कल किसी और के पास जाना है ,फिर तो अपना मायका पराया हो जाता है ,जिस घर में बेटी जन्म ली, खेलकूद कर पली-बढ़ी उसी घर में उसको जगह अभी भी नहीं मिलती है, उसी घर कि वह बस एक मेहमान बन कर रह जाती है ।एक बार जरा सोचिए क्या बीतती होगीउस बेटी पर, जब उसका अपना घर , अपने ही मां-बाप उसे बेगाना समझने लगते हैं, उस घर में उसका सब कुछ छिन कर रह जाता है ,बस एक ही रिश्ता बचता है वह भी मेहमान का, बेटियों का दर्द यहीं खत्म नहीं होता साहब ,जिस घर में बहुत भरोसे के साथ मां-बाप भेजते हैं वह उस घर की भी नहीं हो पाती क्योंकि वहां बहू के रूप में एक नौकरानी चाहिए होता है ,अब ससुराल वाले चाहे प्यार से करवाएं या डांट के, करना तो पड़ता ही है साहब।

कहीं-कहीं तो दहेज रूपी दानव ही मासूम बेटियों के जीवन को लील जाता है ,बेटियां तो जन्म से ही मां-बाप के लिए बोझ समझी जाती हैं , मां-बाप समाज के इन दरिंदों से अपने बेटियों को कितना भी बचा ले फिर भी किसी न किसी बेटी की अस्मत लूट ही ली जाती है ,अस्मत ही नहीं दरिंदगी के साथ हवस मिटाने के बाद उसकी निर्मम हत्या भी कर दी जाती है, जला दिया जाता है, बेटी तड़पती है, रोती है, पैर पकड़ती है ,लेकिन अफसोस दरिंदे नहीं सुनते ही कहां है, बेटियां लड़ेंगी साहब, गर्भ से लड़कर इस धरा पर आती हैं तो समाज के दरिंदे नहीं छोड़ते, दरिंदों से बच जाती है तो ,दहेज की बलिवेदी पर चढ़ाई जाती हैं।कहां बेटियों को प्रताड़ित नहीं किया जाता है ?

किसी न किसी रूप में बेटियों को हर तरह से प्रताड़ित किया ही जाता है, बेटों के बराबर कभी भी अधिकार नहीं मिल पाता ।बेटियों के भी सपने होते हैं साहब, वह भी आजाद होकर रहना चाहती हैं ,बेटियों को मायके और ससुराल जैसे बंधन में बंधकर रहना ही पड़ता है। बेटियां भी बेटों जैसे अपने मां-बाप के मृत्यु के बाद अग्नि देने का अधिकार चाहती हैं साहब,बेटियां भी समाज में स्वतंत्र रहना चाहती हैं ।मैं मानता हूं कि कुछ मां-बाप अपनी बेटियों को स्वतंत्र अधिकार भी दे रखे हैं ,लेकिन समाज के दरिंदे इनको जीने दे तब ना। आज जरूरत है इस पर विचार करने की क्योंकि बेटियां बिना परिवार ,समाज ,देश का कोई कोई भी भविष्य नहीं है ।बेटियों को मात्र बातों में दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती नहीं बनाए साहब, बल्कि जिंदगी के वास्तविक धरातल पर खड़े होकर उन्हें भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का दर्जा दीजिए साहब ।

आज हर क्षेत्र में बेटियां सफलता का परचम लहरा रही है ,लेकिन अभी भी देश के कुछ भागों में उनके प्रति व्यवहार आज भी समान नहीं है ,समाज में ऐसा माहौल होना चाहिए ,जहां पर हर कोई यह निसंकोच कह सकें कि — अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो। सोचिएगा जरूर।

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