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रामचरितमानस–: ”जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। दिनकर कुल यह रीति सुहाई।। ” – मति अनुरुप– जयन्त प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख) 

– जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य – राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

 

श्री राम वनवास की वरदान के प्रसंग में कैकेयी के माध्यम से सौतेलापन और सामान्य लौकिकता का संकेत किया गया है, पर अनेक पात्रों के द्वारा संबंधों की आदर्श शिक्षा भी दी गई है।  यहां माता कौशल्या और श्री राम के चरित्र से सौतेले नातों की आदर्श शिक्षा प्रस्तुत है–

रघुकुल में बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता था, ऐसी सुंदर रीति थी–

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। दिनकर कुल यह रीति सुहाई।।

इसी बात को ध्यान में रखकर ही दशरथ जी ने रामराज्याभिषेक की तैयारी की पर कैकेयी वरदान से स्थिति उलट गई, परंतु राज्याभिषेक की बात पर न राम को हर्ष हुआ और न वनवास सुनकर कोई दुख हुआ–

राउ सुनाइ दीन्ह वनवासू।  सुनि मन भयउ न हरस हरासू।

वनवास और राज्याभिषेक का वरदान सुनकर राम के हर्ष का ठिकाना नहीं था–

“भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू ।” –

भरत तो नैतिक आधार पर अवध साम्राज्य को ठुकरा रहे थे पर राम के विचार में भरत का राज्याभिषेक दोनों के लिए सम्मान का विषय है, क्यों ? – यदि प्रिय भरत अयोध्या का महाराज  बन जायें तो भरत को सेवक के स्थान पर महाराज की पदवी मिल जाएगी  और राम जी को महाराज से भी आगे महाराज के बड़े भाई की पदवी मिलेगी।  दोनों का स्थान ऊंचा हो जाएगा।

जब श्री रघुनाथ जी वन जाने की आज्ञा माता कौशल्या से लेने गए तो मां धर्म संकट में पड़ गयी, न रोकते बन रहा है ना जाने देते–

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारून दाहू। 
धरम सनेह उभय मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदर केरी।

 

माता जी की स्थिति साँप छुछुंदर की हो गयी। (यदि साँप छुछुन्दर को पकड़कर निगल लेता है तो वह कुष्ठ रोग से मर जाता है और यदि उसे छोड़ देता है तो उसकी हवा से साँप अन्धा हो जाता है।)  फिर माता जी ने नारी धर्म का विचार कर– “नारि धरम पति देव न दूजा।”  तथा राम और भरत को सौतेला नहीं समान समझकर– ” राम भरत दोउ सुत सम जानी।”  कहा–

राजु देन कहि दीन्ह बनु, मोहि न सो दुख लेसु।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि, प्रजहिं प्रचंड कलेसु।

 

ऐसा कह कर माता जी ने पति की आज्ञा का भी आदर किया और बन्धु विरोध की लौकिक सम्भावना भी समाप्त कर दी। यहां भी माँ की राजा और प्रजाओं से पहले भरत के दुखी होने की चिन्ता है। माता कौशल्या ने राम और भरत को तो समान माना ही कैकेयी को भी अपने समान ही बताया और माता को पिता से ऊँची होने की शिक्षा दी –

जौ केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।
जौ पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना।

 

अर्थात यदि केवल पिता की आज्ञा होती तो मैं तुम्हें माता की विशेषाधिकार से रोक लेती पर यदि पिता माता दोनों की आज्ञा हो चुकी है तो वन भी सैकड़ो अयोध्या के समान है।

भरत जी भी ननिहाल से लौटकर अपना दर्द सुनाने कौशल्या के पास ही गए।  यहां कौशल्या को राम से प्रिय भरत और भरत को कैकेयी से प्रिय कौशल्या लग रही है–

भरतहिं देखि मातु उठि धाई। मुरूछ्ति अवनि परी झइँ आई।।
सरल सुभाए माय हिय लाए। अति हित मनहु सम फिरि आए।।

 

माता के स्तन से दूध तो अपने पुत्र के लिए ही टपकता है, भरत को देखकर माता कौशल्या के स्तन से दूध टपकने लगा।–

अस कहि मातु भरत हिय लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए।

 

चित्रकूट में भी माँ कौशल्या माता सुनयना से कहती हैं–  “मोरे साेंच भरत कर भारी।”

सौतेले नातों को अपने से अधिक मानने का इससे अधिक प्रबल प्रमाण और क्या होगा?  नातों के निर्वाह का आचरण रामायण के पात्रों से हमें सीखना चाहिए।

 

सियावर रामचंद्र की जय

– जयन्त प्रसाद

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