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15 नवम्बर बिरसा मुंडा जयंती पर विशेष:– “अंग्रेजी सरकार के खिलाफ विद्रोह करनेवाले पहले आदिवासी वीर।”

लेख – एस0के0गुप्त “प्रखर” – सोनप्रभात

‘मैं केवल देह नहीं,
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ,
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं,
मैं भी मर नहीं सकता,
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल, नहीं कर सकता।
उलगुलान!
उलगुलान!!
उलगुलान!!!’’

बिरसा मुंडा की याद में’ शीर्षक से यह कविता आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा ने लिखी हैं। ‘उलगुलान’ यानी आदिवासियों का जल-जंगल- जमीन पर दावेदारी का संघर्ष है।

बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे। अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में उनकी ख्याति आज जग जाहिर थी। सिर्फ 25 साल के जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल किये कि हमारा इतिहास सदैव उनका ऋणी रहेगा।हिंदी साहित्य की महान लेखिका व उपन्यासकार महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ में बिरसा मुंडा के जीवन व आदिवासी स्वाभिमान के लिए उनके संघर्ष को मार्मिक रूप से लेखनीबद्ध किया है।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था | मुंडा रीती रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था । बिरसा मुंडा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था । उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया जहाँ वे खेतो में काम करके अपना जीवन यापन करते थे। उसके बाद फिर काम की तलाश में उनका परिवार बम्बा चला गया । बिरसा मुंडा का पूरा परिवार घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करता था । बिरसा मुंडा बचपन से अपने दोस्तों के साथ रेत में खेलते रहते थे और थोडा बड़ा होने पर उन्हें जंगल में भेड़ चराने जाना पड़ता था। जंगल में भेड़ चराते वक़्त समय व्यतीत करने के लिए बाँसुरी बजाते थे, और कुछ दिनों बाद वे बाँसुरी बजाने में माहिर हो गये। उन्होंने कददू से एक तार वाला वादक यंत्र तुइला बनाया, जिसे बजाया करते थे।

1886 से 1890 का समय जीवन का महत्वपूर्ण रहा जिसमे उन्होंने इसाई धर्म के प्रभाव में अपने धर्म के अंतर को समझा। उस समय सरदार आंदोलन शुरू हो गया था इसलिए उनके पिता ने उनका स्कूल जाना मना कर दिया था, क्योंकि वो मिसनरी स्कूलों का विरोध कर रही थी। बिरसा मुंडा  भी सरदार आन्दोलन में शामिल हो गये, और अपने पारम्परिक रीति रिवाजो के लिए लड़ना शुरू हो गये थे। अब बिरसा मुंडा  आदिवासियों के जमीन छीनने, लोगो को दूसरे धर्म को अपनाने और युवतियों को दलालों द्वारा उठा ले जाने वाले कुकृत्यो को अपनी आँखों से देखा था जिससे उनके मन में अंग्रेजो के अनाचार के प्रति क्रोध की ज्वाला भड़क उठी थी।

अब वो अपने विद्रोह में इतने उग्र हो गये थे कि आदिवासी जनता उनको भगवान मानने लगी थी और आज भी आदिवासी जनता बिरसा को भगवान बिरसा मुंडा के नाम से पूजती है। उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया और अपने आदिवासी लोगो को हिन्दू धर्म के सिद्धांतो को समझाया था। उन्होंने गाय की पूजा करने और गौ-हत्या का विरोध करने की लोगो को सलाह दी, अब उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारा दिया “रानी का शोषण खत्म करो और हमारा साम्राज्य स्थापित करो।” उनके इस नारे को आज भी भारत के आदिवासी इलाको में याद किया जाता है | अंग्रेजो ने आदिवासी कृषि प्रणाली में कई बदलाव किया था जिससे आदिवासियों को काफी नुकसान हुआ। 1895 में लगान माफी के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था।

बिरसा मुंडा ने किसानों का शोषण करने वाले ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी लोगों को दी। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ जमा करने से रोका, बिरसा का कहना था कि मैं तो अपनी जाति को अपना धर्म सिखा रहा हूँ। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करने का प्रयत्न किया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें जल्दी ही छुड़ा लिया। लेकिन जल्द ही वे फिर गिरफ़्तार करके दो वर्ष के लिए हजारीबाग जेल में डाल दिये गये। बाद में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा गया कि वे कोई प्रचार नहीं करेंगे।

24 दिसम्बर 1899 को यह बिरसा मुंडा आन्दोलन आरम्भ हुआ। तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई। अंग्रेजी सेना से भी सीधी मुठभेड़ हुई, किन्तु तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाये। बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में मारे गए। दो व्यक्तियों ने धन के लालच में बिरसा मुंडा को गिरफ़्तार करा दिया। 9 जून 1900 ई. को जेल में उनकी मृत्यु हो गई थी ।आज भी भारत के आदिवासी इलाको में बिरसा मुंडा को भगवान की तरह याद किया जाता है।

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