मुख्य समाचारसोन सभ्यता

रामचरितमानस –ः “निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखन निहारी।” –मति अनुरूप– जयंत प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख) 

– जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य – राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

 

रामचरितमानस के सभी पात्र भिन्न-भिन्न प्रतीकों के रूप में रखे गए हैं। श्री राम परंब्रह्म ज्ञान, माँ सीता भक्ति और श्री लक्ष्मण जी वैराग्य के प्रतीक हैं। “भक्ति ज्ञान बैराग जनु, सोहत धरे शरीर।”  वैरागी अर्थात संसार से विरक्त। यही कारण है कि लक्ष्मण जी का कोई भी कार्य अपना नहीं है। स्वयं के लिए न कभी कुछ सोंचा न किया न जिया। सब कुछ प्रभु के लिए। उनके प्रत्येक आचरण से जीव को वैराग्य की शिक्षा मिलती है और प्रभु विरुद्ध जाते जीव पर कोप करते दिखते हैं और उन्हें संसार से विरक्त कर प्रभु की ओर उन्मुख कर देते हैं।

एक बार तो इन्होंने (लक्ष्मण जी) अपने श्रीमुख से ही निषादराज को वैराग्य की शिक्षा दी, जिसे “लक्ष्मण गीता” के नाम से मानस प्रेमी जानते हैं। जब निषादराज ने प्रभु को वृक्ष के नीचे भूमिशयन करते हुए देखा तो उन्हें बड़ा दुख हुआ–

सोवत प्रभुहिं निहारि निषादू। भयउ प्रेमबस हृदय विषादू।

और कैकेयी को भला–बुरा कहते हुए कर्म की प्रधानता को स्मरण किया। यथा–

कैकय नंदिनि मंद मति, कठिन कुटिलपन कीन्ह।
जेहि रघुनंदन जानकिहिं, सुख अवसर दुख दीन्ह।
सिय रघुबीर कि कानन जाेगू, करम प्रधान सत्य कह लोगू।

इस पर लखनलाल जी ने उन्हें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य युक्त वाणी में समझाया। इनकी शिक्षा में इन तीनों की शिक्षा होने के कारण ही इसे लक्ष्मण गीता का नाम दिया गया–

बोले लखन मधुर मृदुबानी। ज्ञान विराग भगति रस सानी।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।  निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।

इस प्रकार कर्म की प्रधानता की शिक्षा दे रहे हैं।  गीता में– “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” आदि अनेक, जिसके कारण ही निषाद के कृत्यों में उनकी शिक्षा (लक्ष्मण गीता) का प्रभाव स्पष्ट दिखता है और लक्ष्मण जी की ही तरह–  “गुरु पितु मातु न जानउँ काहू।” की तर्ज पर निषाद भी कहता है–  “तजउँ प्रान रघुनाथ निहाेरे।”  और यही शिक्षा अपने लोगों को भी देता है, जिसका वर्णन मानस में विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है।

इसी क्रम में निषाद राज कहते हैं– ” दुहू हाथ मुद मोदक मोरे”  दोनों हाथों में लड्डू अर्थात “हतो वा प्राप्यसि स्वर्ग, जित्वा वा भोक्ष्‍यसे महीम।” – (गीता)   यदि मृत्यु हो जाए तो प्रथम तो युद्ध में, फिर गंगा तट पर, जिस गंगा के दर्शन, स्नान या पान से मोक्ष सुलभ है और पुनः राम काज हित क्षणभंगुर शरीर का त्याग । यथा-

समर मरन पुनि सुरसरि तीरा। राम काज छन भंगु सरीरा।
अर्थात सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरण व्रज। और जातस्य हि ध्रुवो मृत्युं, ध्रुवः जन्म मृतस्य च। (गीता) आदि।

लखन जी के उपदेश से निषाद का आचार परिवर्तित होकर लखन सदृश ही हो गया। निषाद जी भी लक्ष्मण जी की “जो सहाय कर संकर आई। तौ मारउँ रन राम रोहाई।” की तरह भरत जी के लिए कहते हैं–

सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जियत न सुरसरि उतरन देऊँ।

अन्य लोगों को भी निषाद पति लक्ष्मण सदृश लगने लगे।  भरत को भी–

करत दण्डवत देखि तेहि, भरत लीन्ह उर लाइ।
मनहु लखन सन भेंट भई, प्रेम न हृदय समाइ।

सभी माताओं को भी वे लखन जैसे लग रहे हैं–

जानि लखन सम देहि असीसा। जियहु सुखी सय लाख वरीसा।

अयोध्या वासियों को भी निषाद लखन जैसा ही लग रहे हैं–

निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखन निहारी।

सियावर रामचंद्र की जय

–जयंत प्रसाद

  • प्रिय पाठक!  रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंग से जुड़े लेख प्रत्येक शनिवार प्रकाशित होंगे। लेख से सम्बंधित आपके विचार व्हाट्सप न0 लेखक- 9936127657, प्रकाशक-  8953253637 पर आमंत्रित हैं।

Click Here to Download the sonprabhat mobile app from Google Play Store.

 

रामचरितमानस –ः “कुलिसहु चाहि कठोर अति, कोमल कुसुमहु चाहि।” –मति अनुरूप– जयंत प्रसाद

पूर्व प्रकाशित रामचरितमानस अंक – मति अनुरूप– 

 

Live Share Market

जवाब जरूर दे 

सोनभद्र जिले से अलग कर "दुद्धी को जिला बनाओ" मांग को लेकर आपकी क्या राय है?

View Results

Loading ... Loading ...

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
.
Website Designed by Sonprabhat Live +91 9935557537
.
Close
Close