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रामचरितमानस-: “सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महु चरन बन्दि सुख माना।“- मति अनुरुप- अंक 38. जयंत प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख) 

– जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य – राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महु चरन बन्दि सुख माना।

श्रीरामचरित मानस की यह पंक्ति सीता हरण प्रसंग की है। सीता जी की बात सुनकर रावण को क्रोध हुआ और मन ही मन सीता जी की चरणों में वन्दना की तथा सुखी हुआ।

प्रायः पाठक गण इस वर्णन को इस बात से जोडकर देखते हैं कि रावण को राम के परमेश्वर होने का भान हो गया था और वह सीता को जगत् जननी मान कर प्रणाम कर सुखी हुआ। इस बात की पुष्टि पाठक गण उस विचार से करते है कि –

खर दूषन मोहिं सम बलवन्ता। तिन्हहिं को मारइ बिनु भगवन्ता।
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौ भगवन्त लीन्ह अवतारा।
तौ मैं जाइ वैरू हठि करउँ। प्रभु सर प्रान तजे भव तरउँ।

पर मेरे विचार से ऐसा नहीं था। रावण के मन में उपर्युक्त विचार तो उठा था पर जीवन भर रावण यही पता लगाता रह गया कि राम नर हैं या नारायण? यदि वह यह जान जाता कि राम नर नहीं नारायण हैं तो रावण का वध सम्भव ही नहीं था, क्याेंकि उसका वरदान यही था न कि –

हम काहू के मरहिं न मारे। बानर मनुज जाति दुइ बारे।

इस कारण प्रभु – लीला कुछ इस प्रकार होती रही कि उसे कभी भी राम के नारायण होने का आभास दृढ़ नहीं हुआ। वह सदैव राम को तपस्वी राजकुमार ही समझता रहा, फिर रावण सीता जी की बात से क्रोधित क्यों हुआ? वंदना क्यों की? और सुखी किस कारण हुआ? आइए इसी पर विचार करते हैं–

प्रथमतः तो इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यह तीनों भाव (क्रोधित होना, वंदना करना और सुखी होना) रावण के मन में उत्पन्न हुआ और सीता जी की बात सुनकर हुआ।

सर्वप्रथम रावण के क्रोधित होने का कारण यह था कि रावण एक महाप्रतापी राजा था। उसने अपनी भुजाओं के बल पर विश्व को वश में कर लिया था–

भुजबल विश्व वस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।

आज तक रावण के सामने किसी को कुछ अपशब्द कहने का साहस नहीं हुआ, पर आज यह साधारण तपसी की भार्या उसे दुष्ट, खल, छुद्र,सस और कालवश कह कर अपमानित करने का साहस किया। अतः रावण का क्रोधित होना स्वाभाविक ही था। सीता जी ने कहा था–

बोलेहु वचन दुष्ट की नाई । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा  तथा

जिमि हरि बधुहि छुद्र सस चाहा। भयसि कालबस निसिचर नाहा।

सीता जी के चरणों में वंदना करने की भावना रावण में इस कारण आई क्योंकि उसे आभास हो गया था, कि यह नारी तन से तो सुंदर है ही मन से भी परम साध्वी और पतिव्रता है। जो इस फटे हाल में रहकर भी पतिव्रत धर्म पर अडिग है और ऐसी पतिव्रता सदैव वंदनीय है। स्त्री अपनी पतिव्रता शक्ति से कुछ भी कर सकती है। रावण की पत्नी मंदोदरी भी परम पतिव्रता थी, इस कारण वह पतिव्रता की शक्ति और महानता को जानता था।

अतः अपनी अभीष्ट की सिद्धि हेतु उसने मन ही मन सीता की वंदना की। श्री सीता जी ने श्रीराम को सिंह और अपने को ‘हरिवधुहि’ अर्थात सिंहनी बताकर राम की श्रेष्ठता और अपने को अनन्य भोग्या होने का संकेत कर अपने सतीत्व का परिचय दिया। इसी कारण रावण ने मन ही मन सीता जी को प्रणाम किया। अब रावण को सुख क्यों हुआ? वस्तुतः रावण मन ही मन सीता की महानता और सुंदर व्यक्तित्व का अच्छी तरह से अनुमान कर लिया था और उसे अपनी शक्ति पर भी रंच मात्र संदेह नहीं था।सोचता था इसे मैं अपनी रानी के रूप में प्राप्त कर ही लूंगा, रावण ने सोचा कि ऐसी रूपवती, गुणवती नारी मुझे पत्नी के रूप में प्राप्त होने वाली है, जो संसार में दुर्लभ है और ऐसी पत्नी का गौरव संसार में किसी को भी सुलभ नहीं है, जो मुझे होने वाली है।अतः उसके मन में सुख की भावना जागृत हुई।

सभी में सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण विद्यमान रहते हैं, और जिस में जिस गुण की प्रधानता होती है मानव उसी प्रकृति का माना जाता है। शेष दो गुण क्षणिक होते हैं और यह गुण भी थोड़े समय के लिए कभी-कभी लक्षित होते रहते हैं। रावण तमोगुणी था उसका मूल स्वभाव था कि –

क्रोधवंत तब रावन, लीन्हेसि रथ बैठाइ।

इस प्रधान गुण के साथ ही उसमें अन्य गुण भी क्षणिक लक्षित हो रहे हैं–

सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महु चरन बन्दि सुख माना। 

जय जय श्री सीताराम

  -जयंत प्रसाद

 

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