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रामचरितमानस-: “उमा दारू जोषित की नाईं। सबहिं नचावत राम गोसाईं।”- मति अनुरुप- अंक 41. जयंत प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख) रामचरितमानस

– जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य – राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

 

उमा दारू जोषित की नाईं। सबहिं नचावत राम गोसाईं।

अहंकार में व्यक्ति का यथार्थ बोध की शक्ति अत्यंत क्षीण हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति अपने मन के भ्रमात्मक अर्थ को ही यथार्थ समझ लेता है। जब राजा शील निधि ने अपनी कन्या विश्वमोहिनी की हस्तरेखा नारद को दिखाकर इसके गुण दोषों का विवेचन करने का निवेदन किया तो मोहाहंकार ग्रसित नारद जी ने सोचा कि जिसको यह कन्या वरण करेगी, वह अमर हो जाएगा, उसे युद्ध भूमि में कोई हरा नहीं पाएगा और तीनो लोक उसकी सेवा करेंगे। इस कारण ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे यह कन्या मेरा वरण कर ले–

जो एहि बरइ अमर सोइ होई।  समर भूमि तेहि जीत न कोई।
सेवहिं सकल चराचर ताही । बरइ सील निधि कन्या जाही।

मोह ग्रसित नारद हस्तरेखा का यथार्थ नहीं समझ सके। कन्या की हस्त रेखाएं तो यह सूचित कर रही थी कि  यह कन्या उसी का वरण करेगी जो अमर होगा, अजेय होगा और चराचर सेवित होगा। अर्थात् वह कन्या प्रभु का ही वरण करेगी। पर नारद ने मोह के कारण अपने मनोनुकूल हस्त रेखाओं का अर्थ लगाया। अब नारद कन्या को प्राप्त कर अमर विजयी और सर्व सेवित होने के लिए जप,तप न करके आसानी से भाग्य का भरोसा किया, जबकि अमर अजेय आदि होने के लिए जप ,तप, कर्म के अलावा भाग्य से संभावना नहीं के बराबर है।

जप तप कछु न होइ तेहिं काला। हे बिधि मिलइ कवन विधि बाला।

मानसकार ने उस प्रसंग में नारद के मुख से प्रभु के लिए “हरि” शब्द बार-बार प्रयोग किया, यथा-

“हरिसन मांगौं सुंदर ताई।,” ” मोरे हित हरि सम नहिं कोई।”

हरि का एक अर्थ बंदर भी होता है, अतः विश्वरूप प्रभु ने अपना हरि का (बंदर का) रूप प्रदान किया। मोही नारद को अपने उस रूप को दर्पण में देखने का भी अवसर नहीं था, कन्या पाने की जल्दी थी–  ” देखहु काम प्रताप बड़ाई”  नारद ने एक निवेदन प्रभु से और किया।हे प्रभु! जिस प्रकार मेरा हित हो जल्दी से वही करें–

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।

स्वामी तो दास का हित चाहे जैसे करें, निर्विवाद है इस कारण प्रभु ने अपने दास का हित की याचना परम हित से करने की ठानी–

जेहि विधि होइहिं परम हित, नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु, बचन न मृषा हमार।

और इसके साथ ही प्रभु ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि रोगी के मांगने पर भी वैद्य कुपथ्य नहीं देता, ऐसा हित करने का हमने ठाना है।

“एहि बिधि हित तुम्हार मै ठयउ।” पर माया के कारण ज्ञान शून्य नारद को कुछ समझ नहीं आया। –

माया बिवस भए मुनि मूढ़ा । समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।

इस प्रकार प्रभु ने अपने भक्त को माया मोह में पडने और संसारी जीव होने से बचा लिया। पर नारद की हंसी तो हुई?  कर्म का फल तो मिलना ही चाहिए पर प्रभु ने अपने भक्त की उपहास से बचाने के लिए ऐसा भी किया कि उस रूप को कोई सामान्य नहीं देख सका–

सो चरित्र लखि काहु न पावा। नारद जानि सबहि सिर नावा।
काहु न लखा सो चरित विसेखा। सो सरुप नृप कन्या देखा।

अन्ततः प्रभु ने राजकुमार के रूप में उस कन्या को प्राप्त कर लिया तो नारद अत्यंत व्याकुल हो गये। शिवगणों ने उन्हें अपना रुप दर्पण में देखनें की सलाह दी – “निज मुख मुकुर बिलोकहु जाईं।”  शायद दर्पण तक पहुंचने पर कुछ समय निकल जाने के कारण क्रोध शांत हो जाए, कुछ विचार आ जाए पर उन्हें जल्दी थी और यथार्थ विम्ब दिखाने वाला शान्त दर्पण के बजाए अशान्त वारि में अपना रूप देखा जो और भी विकृत दिखाई दी और पुनः अपना रूप देखने पर भी मन शांत नहीं हुआ और प्रभु को ही शाप दे डाला। प्रभु की लीला विचित्र है अब मोह विगत नारद ने जब अपने शाप के झूठा होने की इच्छा व्यक्त की तो प्रभु ने कहा यह सब मेरी इच्छा से हुआ–

मृषा होउ मम साप कृपाला। मम इच्छा कह दीन दयाला।

प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि है–

उमा दारू जोषित की नाई। सबहिं नचावत राम गोसाई।

जय जय श्री सीताराम

-जयंत प्रसाद

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रामचरितमानस-: “सम्भु दीन्ह उपदेस हित, नहिं नारदहिं सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु, हरि इच्छा बलवान।“- मति अनुरुप- अंक 40. जयंत प्रसाद

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