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सम्पादकीय-: चलते -चलते यूँ अलविदा न कहना, प्रवासी मजदूरों की व्यथा।

सोनप्रभात – सोनभद्र

सुरेश गुप्त”ग्वालियरी”- (सम्पादक मण्डल सदस्य)

  • – सम्पादकीय लेख

यह एक हकीकत है, मुम्बई से चलकर आधा सैकड़ा श्रमिकों का जत्था 150 किलोमीटर चलने के बाद उसी में सम्मलित एक साथी भोजन पानी के अनुपलब्धता के कारण मौत के गाल में समा जाता है।
यह मात्र एक उदाहरण है, जब कि हर प्रांत में कमोवेश अपनी जान हथेली पर रखकर ये श्रमिक हजारों किलोमीटर की यात्रा जंगल ,पहाडियों,नदियों को पारकर अपने गन्तव्य पर पहुँचना चाहते है। इनकी इस विषम परिस्थितियो का शासन व प्रशासन को गम्भीरता से आंकलन करना चाहिए। कुछ तो मजबूरियां रही होगी वरना भूखे प्यासे दुधमुंहे बच्चे की उंगली थामे ये परिवार इस तरह पलायन नही करते।

इनका कहना भी सर्वदा उचित ही है,जब मरना ही है तो अपनों के बीच मे ही क्यों न मरा जाए। मात्र कागजों पर दावा करके या फोटो खिंचवाकर इन जरूरत मंदों का पेट नही भरा जा सकता है। ये शिल्पकार, मेहनत कश व श्रमजीवी वर्ग है, कृषि, निर्माण व उत्पादन क्षेत्र में इनके योगदान को कम करके नही आंका जा सकता।

वर्तमान में इस वर्ग को सहानभूति की आवश्यकता है, सम्मान व गम्भीरता के साथ इनके समस्यायों का निराकरण किया जाना चाहिए। जिस प्रकार हाई प्रोफाइल व्यक्तित्व तथा अन्य को घर वापसी करायी जा रही है, उसी प्रकार गरीब प्रवासी मजदूरों को भी घर वापसी विशेष निगरानी तथा निर्देशन में इंतजाम किया जाना चाहिए।

  • “वैसे तो जाना चाहता था दूर बहुत मैं,
    था पेट मेरे पैर में जंजीर की तरह।”

“सोनप्रभात, लॉक डाउन की स्थिति से सुदूर क्षेत्रों में फंसे प्रवासी मजदूरों के प्रति पूरी निष्ठा, संवेदना रखता है, साथ ही जिम्मेदार लोगों से अपील करता है,कि यथासंभव प्रवासी मजदूरों की घर वापसी पर ध्यान दें। जिससे मानवता का हति न हो।”

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