यूपी में ब्लॉक प्रमुख भी बने प्रशासक, पंचायत चुनाव तक संभालेंगे जिम्मेदारी; बड़े फैसलों पर रहेगी रोक
योगी सरकार का बड़ा प्रशासनिक निर्णय, पहली बार ग्राम प्रधान, जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख एक साथ प्रशासक बनाए गए
lucknow
4:20 PM, Jul 20, 2026
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Edited By: Ashish Gupta , Reported By: Digital News Desk

Photo : Sonprabhat News
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसला लेते हुए राज्य के सभी 826 ब्लॉक प्रमुखों को उनके कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया है। इस आदेश के बाद ब्लॉक प्रमुख आगामी पंचायत चुनाव संपन्न होने तक अपने-अपने क्षेत्र में प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। हालांकि, उन्हें बड़े नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा और वे केवल नियमित प्रशासनिक कार्यों का संचालन करेंगे।
यह निर्णय इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश में पहली बार ग्राम प्रधान, जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख—तीनों निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को एक साथ प्रशासक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी गई है।

कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी बनी रहेगी जिम्मेदारी
सामान्य परिस्थितियों में ब्लॉक प्रमुख का कार्यकाल समाप्त होने के बाद संबंधित खंड विकास अधिकारी (BDO) को प्रशासक नियुक्त किया जाता है। लेकिन इस बार सरकार ने अलग व्यवस्था अपनाते हुए वर्तमान ब्लॉक प्रमुखों को ही प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया है।
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सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव में विलंब होने की स्थिति में विकास कार्यों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से यह व्यवस्था लागू की गई है।
किन अधिकारों के साथ करेंगे काम?
प्रशासक के रूप में नियुक्त ब्लॉक प्रमुखों के अधिकार सीमित रहेंगे। शासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि—
- कोई भी बड़ा या नीतिगत निर्णय नहीं लिया जा सकेगा।
- केवल नियमित प्रशासनिक एवं विकास कार्य जारी रहेंगे।
- महत्वपूर्ण प्रस्ताव जिला अधिकारी (DM) के माध्यम से शासन को भेजे जाएंगे।
- अंतिम स्वीकृति शासन स्तर पर ही दी जाएगी।
- जल्द ही विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे, जिनमें प्रशासकों के अधिकार और सीमाएं स्पष्ट की जाएंगी।
पहले प्रधान और जिला पंचायत अध्यक्ष भी बनाए जा चुके हैं प्रशासक
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इससे पहले राज्य सरकार 57 हजार से अधिक ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त कर चुकी है। इसके बाद सभी 75 जिला पंचायत अध्यक्षों को भी प्रशासकीय जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। अब ब्लॉक प्रमुखों को भी इसी व्यवस्था में शामिल कर लिया गया है।
सरकार के इस फैसले के पीछे क्या वजह?
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव में देरी के कारण निर्वाचित प्रतिनिधियों में अपने अधिकार समाप्त होने की आशंका बढ़ रही थी। सरकार के इस कदम से—
- विकास योजनाओं की निरंतरता बनी रहेगी।
- निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रशासनिक अनुभव उपयोग में आता रहेगा।
- स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक शून्यता नहीं होगी।
- पंचायत चुनाव होने तक व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहेगी।
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विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इससे वर्तमान जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय बने रहने का अवसर मिलेगा, जिसका राजनीतिक प्रभाव आगामी पंचायत चुनावों में भी देखने को मिल सकता है।

हाईकोर्ट में पहले से चल रही है कानूनी चुनौती
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के निर्णय को लेकर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन है। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासक नियुक्त करने का कानूनी आधार क्या है।
कोर्ट ने पंचायत चुनाव में हुई देरी पर भी सवाल उठाते हुए सरकार से विस्तृत जवाब और चुनाव कराने की समय-सीमा मांगी थी। फिलहाल इस विषय पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।
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पंचायत चुनाव में देरी पर सियासत भी तेज
पंचायत चुनाव समय पर न होने को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी जारी हैं। सत्ता पक्ष का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कानूनी और प्रशासनिक कारणों के चलते समय प्रभावित हुआ, जबकि विपक्ष लगातार सरकार पर चुनाव टालने का आरोप लगा रहा है।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें पंचायत चुनाव की घोषणा और हाईकोर्ट में लंबित मामले पर टिकी हैं। यदि चुनाव कार्यक्रम जल्द घोषित होता है तो प्रशासक के रूप में नियुक्त वर्तमान प्रतिनिधियों का कार्यकाल चुनाव सम्पन्न होने तक जारी रहेगा। वहीं अदालत के अंतिम निर्णय का भी इस व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
Source : National Media & Reports






