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Chaiti Chhath 2025: चैती और कार्तिक छठ के दो रूप, एक आस्था – जानें अंतर और महत्व

Chaiti Chhath 2025 : छठ पूजा का जीवंत त्योहार, जो सूर्य देव और छठी माता को समर्पित है, पूरे भारत में खास उत्साह के साथ मनाया जाता है, विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में। यह महान पर्व साल में दो बार मनाया जाता है—एक बार कार्तिक माह में (दिवाली के बाद) और दूसरी बार चैत्र माह में, जिसे चैती छठ या यमुना छठ के नाम से भी जाना जाता है। छठ को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, जिसमें 36 घंटे का निर्जला उपवास शामिल है, जो इसे आध्यात्मिक रूप से बेहद फलदायी बनाता है। इस साल चैती छठ 1 अप्रैल से शुरू होगी, जिसमें 3 अप्रैल को सांध्य अर्घ्य और 4 अप्रैल को उषा अर्घ्य के साथ यह पर्व समाप्त होगा।

1:34 PM, Mar 28, 2025

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Edited by: Ashish Gupta

Chaiti Chhath 2025: चैती और कार्तिक छठ के दो रूप, एक आस्था – जानें अंतर और महत्व
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सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

Chaiti Chhath 2025 : छठ पूजा का जीवंत त्योहार, जो सूर्य देव और छठी माता को समर्पित है, पूरे भारत में खास उत्साह के साथ मनाया जाता है, विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में। यह महान पर्व साल में दो बार मनाया जाता है—एक बार कार्तिक माह में (दिवाली के बाद) और दूसरी बार चैत्र माह में, जिसे चैती छठ या यमुना छठ के नाम से भी जाना जाता है। छठ को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, जिसमें 36 घंटे का निर्जला उपवास शामिल है, जो इसे आध्यात्मिक रूप से बेहद फलदायी बनाता है। इस साल चैती छठ 1 अप्रैल से शुरू होगी, जिसमें 3 अप्रैल को सांध्य अर्घ्य और 4 अप्रैल को उषा अर्घ्य के साथ यह पर्व समाप्त होगा।

चैती छठ और कार्तिक छठ में अंतर

हालांकि चैती और कार्तिक छठ के नियम और पूजा विधि एक समान हैं, लेकिन इनके समय और पौराणिक महत्व में अंतर है। चैती छठ चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मनाई जाती है, जो हिंदू नववर्ष की शुरुआत के साथ जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। छठे दिन उन्होंने सौरमंडल का निर्माण किया। उस समय ब्रह्मांड अंधेरे और जल से घिरा था। इसी जल में श्रीहरि योगमाया के बंधन में शयन कर रहे थे। जब उनके नेत्र खुले, तो सूर्य और चंद्रमा का जन्म हुआ। इसके बाद योगमाया ने ब्रह्मा जी की ब्राह्मी शक्ति से जन्म लिया, जिसका नाम देवसेना पड़ा। देवसेना को सूर्य की पहली किरण माना जाता है और वह सूर्य देव की बहन हैं। इसीलिए चैती छठ में सूर्य देव और देवसेना की पूजा की जाती है, जो संसार को प्रकाश देने की स्मृति है।

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वहीं, कार्तिक छठ का संबंध त्रेता और द्वापर युग से है। रामायण के अनुसार, रावण का वध करने के बाद जब भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को माता सीता ने कुल की सुख-शांति के लिए छठी माता और सूर्य देव की पूजा की थी। महाभारत में भी द्रौपदी द्वारा यह व्रत करने की कथा मिलती है। ये ऐतिहासिक संदर्भ कार्तिक छठ को खास बनाते हैं।

छठ पूजा के नियम

छठ पूजा में स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। भक्तों को सात्विक भोजन करना चाहिए और लहसुन-प्याज से परहेज करना होता है। प्रसाद केवल व्रत करने वाले को ही बनाना चाहिए। यह पर्व शुद्ध आचार-विचार और संयम की भावना को बढ़ावा देता है।

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छठ पूजा का महत्व

हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष स्थान है। यह व्रत परिवार में सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन के लिए किया जाता है। इसके अलावा, यह आत्म-नियंत्रण और शुद्धता की भावना को जागृत करता है।

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चैती छठ के नजदीक आते ही भक्त तैयारियों में जुट गए हैं, जो सूर्य देव और छठी माता के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को दर्शाता है। चाहे चैत्र हो या कार्तिक, छठ प्रकृति, भक्ति और पारिवारिक बंधन का अनमोल उत्सव बना रहेगा।

नोट: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि इस प्रकाशन द्वारा नहीं की गई है।

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