Mahabharat: श्रीकृष्ण की चतुर रणनीति व जरासंध के विनाश से महाभारत की नींव
Mahabharat : महाभारत की कथाएं अपने आप में अनंत रहस्य और नीति समेटे हुए हैं। इनमें से एक ऐसी ही रोचक और प्रेरक कहानी है मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध की, जिसके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा चमत्कारों और रणनीति से भरी पड़ी है। भगवान श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता और चतुराई ने न केवल जरासंध के अत्याचारों का अंत किया, बल्कि धरती को दुष्ट शक्तियों से मुक्त करने का मार्ग भी प्रशस्त किया। आइए, इस कथा को विस्तार से जानें।
1:08 PM, Apr 4, 2025
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Edited by: Son Prabhat

Mahabharat : महाभारत की कथाएं अपने आप में अनंत रहस्य और नीति समेटे हुए हैं। इनमें से एक ऐसी ही रोचक और प्रेरक कहानी है मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध की, जिसके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा चमत्कारों और रणनीति से भरी पड़ी है। भगवान श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता और चतुराई ने न केवल जरासंध के अत्याचारों का अंत किया, बल्कि धरती को दुष्ट शक्तियों से मुक्त करने का मार्ग भी प्रशस्त किया। आइए, इस कथा को विस्तार से जानें।
जरासंध का जन्म : एक चमत्कारी उत्पत्ति
मगध के राजा बृहद्रथ एक न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासक थे, लेकिन संतानहीन होने के कारण उनका मन उदास रहता था। अपनी दो पत्नियों, जो जुड़वां बहनें थीं, के साथ वे वन में तपस्या के लिए चले गए। वहां एक ऋषि ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें एक जादुई आम दिया, जिसे खाने से उनकी पत्नी को पुत्र की प्राप्ति होनी थी। बृहद्रथ ने फल को दो बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी दोनों रानियों को दे दिया।
समय आने पर दोनों रानियों ने गर्भ से आधे-अधूरे बच्चों को जन्म दिया—एक के पास आधा शरीर, एक आंख, एक हाथ और एक पैर। यह देखकर राजा का उत्साह भय में बदल गया। रात के अंधेरे में दाई ने इन आधे बच्चों को काले कपड़े में लपेटकर नगर के बाहर फेंक दिया। उसी रात जरा नामक राक्षसी भोजन की तलाश में वहां पहुंची। जैसे ही उसने दोनों हिस्सों को उठाया, चमत्कार हुआ—दोनों आधे बच्चे आपस में जुड़ गए और एक स्वस्थ, सुंदर शिशु बन गया। जरा ने अपनी शक्ति से जान लिया कि यह राजा बृहद्रथ का पुत्र है। उसने बच्चे को राजा को सौंप दिया। खुशी से अभिभूत बृहद्रथ ने अपने बेटे का नाम "जरासंध" रखा, जिसका अर्थ है "जरा द्वारा जोड़ा गया।"
श्रीकृष्ण और जरासंध : शत्रुता की शुरुआत
जरासंध बड़ा हुआ और मगध का शक्तिशाली राजा बना। उसकी दो बेटियों का विवाह मथुरा के राजा कंस से हुआ था, जो श्रीकृष्ण का मामा था। जब श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तो जरासंध ने इसे व्यक्तिगत अपमान माना और कृष्ण को अपना सबसे बड़ा शत्रु घोषित कर दिया। कंस की मृत्यु का बदला लेने के लिए उसने मथुरा पर 18 बार आक्रमण किया। हर बार श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम ने उसकी सेना को परास्त किया, लेकिन जरासंध को जीवित छोड़ दिया।
यह बात बलराम को अखरती थी। एक युद्ध के बाद उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, "आप हर बार जरासंध को क्यों छोड़ देते हैं? वह बार-बार दुष्ट राजाओं को इकट्ठा करता है और हम पर हमला करता है।" श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "भैया, मैं उसे जानबूझकर छोड़ता हूं। जरासंध पृथ्वी के कोने-कोने से दुष्टों को अपने साथ लाता है। इससे मुझे एक ही स्थान पर रहकर सभी दुष्टों का संहार करने का मौका मिलता है। अगर ऐसा न होता, तो मुझे इन दुष्टों को मारने के लिए पूरी धरती का भ्रमण करना पड़ता। अंत में जरासंध को भी खत्म कर दूंगा।"
राजसूय यज्ञ और पांडवों की चुनौती
जब पांडव वनवास से लौटे और इंद्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाया, तो नारद मुनि ने युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। लेकिन श्रीकृष्ण ने चेतावनी दी कि इसके लिए जरासंध को परास्त करना होगा। जरासंध की शक्ति और उसकी श्रीकृष्ण से दुश्मनी को देखते हुए युधिष्ठिर ने यज्ञ का विचार छोड़ने की सोची। लेकिन भीम और अर्जुन ने चुनौती स्वीकार की। अंततः श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन मगध के लिए निकल पड़े।
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तीनों ने ब्राह्मण छात्रों का वेश धारण किया और चतुराई से जरासंध के महल में दीवार फांदकर प्रवेश किया। जरासंध ने उनकी वास्तविक पहचान भांप ली और पूछा, "आप लोग कौन हैं?" श्रीकृष्ण ने जवाब दिया, "हम तुम्हारे शत्रु हैं। मैं कृष्ण हूं, और ये अर्जुन व भीम हैं। हम तुम्हें चुनौती देते हैं।" जरासंध ने अर्जुन को कमजोर समझा और भीम को अपने लिए योग्य प्रतिद्वंद्वी चुना।
भीम और जरासंध का भीषण युद्ध
भीम और जरासंध के बीच मल्लयुद्ध शुरू हुआ। दोनों योद्धाओं ने 14 दिनों तक दिन-रात बिना रुके एक-दूसरे से मुकाबला किया। जैसे-जैसे जरासंध कमजोर पड़ा, भीम ने उसे हवा में उठाकर सौ बार घुमाया और जमीन पर पटक दिया। फिर उसके शरीर को दो हिस्सों में फाड़ दिया। लेकिन चमत्कारिक रूप से जरासंध के टुकड़े फिर जुड़ गए और वह जीवित हो उठा।
यह देख श्रीकृष्ण ने भीम को संकेत दिया। उन्होंने एक पत्ते को फाड़कर उसके टुकड़ों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। भीम समझ गए। उन्होंने फिर से जरासंध को फाड़ा और उसके शरीर के दोनों हिस्सों को दूर-दूर फेंक दिया। इस बार टुकड़े जुड़ न सके, और जरासंध की मृत्यु हो गई।
जरासंध का महाभारत में होना बदल सकता था खेल
अगर जरासंध महाभारत के युद्ध तक जीवित रहता, तो वह कौरवों का साथ दे सकता था। उसकी शक्ति और सेना पांडवों के लिए बड़ी चुनौती बनती। लेकिन श्रीकृष्ण अपनी दूरदर्शिता से जानते थे कि महाभारत का युद्ध धर्म की स्थापना के लिए आवश्यक है। इसलिए उन्होंने जरासंध को पहले ही खत्म करने की योजना बनाई।
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