रामचरितमानस–: "होइहिं सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावे साखा।" – मति अनुरुप– जयन्त प्रसाद
सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)
sonbhadra
12:19 PM, Sep 12, 2020
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Edited by: Ashish Gupta

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)
- जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य - राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )
–मति अनुरूप–
ॐ साम्ब शिवाय नम:
श्री हनुमते नमः
"एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुम्भज रिषि पाही।"
एक बार की बात है, त्रेता युग में शिवजी अगस्त ऋषि के पास राम कथा सुनने गए, साथ में मैया सती भी थी। तो मानसकार ने मैया सती को विशेष विशेषणों से युक्त संबोधन दिया। यथा– "संग सती जग जननि भवानी।" पर कथा वहां शिवजी ने ही सुनी। सती वहां जाकर भी कथा से वंचित रहीं–
रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परमसुख मानीं।

तब लौटते समय मानसकार ने उसी सती के लिए संबोधित किया–
"चले भवन संग दच्छ कुमारी।"
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अर्थात जब कथा सुनने जा रहे थे तो
जग जननि भवानी
और जाकर भी कथा न सुनने पर
दच्छ कुमारी
, दच्छ की पुत्री या एक चालाक की पुत्री। कथा में मन ना लगने या न सुन पाने के कारण मैया सती को ऐसा मोह (संसय) हुआ जिसका निवारण शिवजी के बार-बार प्रयास करने पर भी संभव नहीं हुआ, तो शिवजी ने विचार किया कि यह सब प्रभु के चाहने से ही हो रहा है–
मोरेहु कहे न संसय जाहीं। विधि विपरीत भलाई नाहीं।। हरि इच्छा भावी बलवाना। ह्रदय विचारत संभु सुजाना।।
अर्थात यह भावी है, जिसमें हरि की इच्छा शामिल है। यद्यपि कि शिवजी भावी को भी मिटा सकने में समर्थ हैं–
"भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।"

तथापि जिस भावी में हरि की इच्छा शामिल हो, उसे शिवजी मिटा ही नहीं सकते। क्योंकि भावी को मिटाने का सामर्थ्य भी ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होती है ⁄ हुई है। इसी कारण शिवजी ने यह विचार किया कि–
होइहिं सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।
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अर्थात
" राजी हैं हम उसी में, जिसमें तेरी रजा है।"
और सती को परीक्षा देने की अनुमति प्रदान कर ईश्वर की लीला या इच्छा में सहयोग कर दिया, जबकि ईश्वर की परीक्षा नहीं ली जाती बल्कि प्रतीक्षा करना ही उचित होता है–
जो तुम्हरे मन अति संदेहू। तो किन जाइ परीछा लेहू।
यही मर्म राम वन गमन के पश्चात भरत के ननिहाल से लौटने पर भरत वशिष्ठ संवाद में भी लक्षित होता है। जब वशिष्ठ जी ने भावी को प्रबल कहा–
सुनहु भरत भावी प्रबल, विलखि कहेउ मुनिनाथ।
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यहां भी वशिष्ठ जी ने शिवजी के–
"हरि इच्छा भावी बलवाना"
की तरह उस भावी को
प्रवल
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कह कर उसमें हरि इच्छा शामिल होने का संकेत किया, जो चित्रकूट में भरत वशिष्ठ संवाद से स्पष्ट हो रहा है। जब भरत ने वशिष्ठ जी को भावी मिटाने में समर्थ बताया यथा–
सो गोसाइँ बिधि गति जेहि छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।
बूझिय मोहिं उपाय अब, सो सब मोर अभागु।
तब वशिष्ट जी ने बात स्पष्ट कर दी–
तात बात फुरि राम कृपा ही। राम विमुख सिधि सपनेहु नाहीं।
अर्थात शिवजी को या वशिष्ठ जी को भी भावी को मिटा सकने का सामर्थ्य राम की कृपा से ही प्राप्त है और जिस भावी में ईश्वर की इच्छा शामिल है वह भावी बलवान और प्रवल है, उसे कोई मिटा नहीं सकता–
कह मुनीस हिमवन्त सुनु, जो विधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि, कोउ न मेटनिहार।
अस्तु जिस भवितव्यता में ईश्वर इच्छा शामिल है, उसे तो होकर ही रहना है, उसे कोई टाल नहीं सकता–
– सियावर रामचंद्र की जय–
– जयन्त प्रसाद

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