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रामचरितमानस–: "तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।"– मति अनुरूप– अंक.28 – जयन्त प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

sonbhadra

12:45 PM, Feb 13, 2021

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Edited by: Ashish Gupta

रामचरितमानस–: "तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।"– मति अनुरूप– अंक.28 – जयन्त प्रसाद
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सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

- जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य - राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।

श्रीराम राज्याभिषेक के पश्चात प्रभु सबको सम्मान पूर्वक विदा करते हैं और उक्त चौपाई अपने परम सखा निषाद नाथ के लिए कहते हुए उन्हें भरत के समान अपना भाई संबोधित कर रहे हैं तथा उन्हें सदैव अपने नगर में आते जाते रहने का निवेदन करते हैं।

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वास्तव में निषाद राज भरत के ही समान प्रभु सेवक व भक्त थे। मानस में अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है भक्तमाल में यह उल्लेखित है कि राम से बिछड़ कर जिस प्रकार भरत ने नंदीग्राम में पृथ्वी खोदकर कुश बिछाकर 14 वर्ष तक बिताया–  यथा–

"महि खनि कुस सााथरी सँवारी"

ठीक उसी प्रकार निषादराज भी राम के लौटने तक आंखें मूंद कर रहे। रोते-रोते उनकी आंखों में रुधिर प्रवाह होने लगा और आंखें सूज गई थी। पर उनकी प्रतिज्ञा थी कि मेरी आंखें राम सीता को देखकर ही खुलेंगी और जब तक प्रभु सामने नहीं आए राज सुख से विरक्त हो रोते रहे। प्रभु को वे सदैव भरत जैसा ही प्रिय लगते थे–

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"सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयों।"

इसके अतिरिक्त भी निषाद और भरत का एक सा होना अनेक स्थानों पर प्रमाणित है। चित्रकूट में भरत और निषाद मिलन की एकरूपता दर्शनीय है–

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  • भरत के लिए–

१़- भूतल परे लकुटि की नाईं।

२- वरबस लिए उठाइं उर लाए।

३- उर लाए कृपा निधान।

  • निषादराज के लिए–

१- परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही।

२- हरसि उठाई लियो उर लाई।

३-लियो हृदय साइ कृपा निधान।

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इसी प्रकार अयोध्या में भरत और निषाद मिलन की समानता प्रस्तुत है–

  • भरत के लिए–

१- परेभूमि

२- नहि उठत उठाए।

३- बर करि कृपासिन्धु उर लाए।

४- बूझत कृपानिधि कुशल।

५- अब कुशल कौसलनाथ आरत जानि।

६- नमत जिन्हहिं सुर मुनि संकरू अज।

  • तथा निषादनाथ के लिए–

२- हरसि उठाइ लियो उर लाई।

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३- लियो हृदय लाइ कृपा निधान।

४- बूझी कुशल सो कर बीनती।

५- अब कुसल पद पंकज विलोकि।

६- बिरंचि संकर सेब्य जे।

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इस प्रकार श्री निषाद जी के संबंध में अपने 9 जनवरी अंक 24  में यह प्रमाणित है वे लखन सदृश तथा वर्तमान अंक में यह प्रमाणित हो रहा है कि वे भरत सदृश थे। अर्थात् वियोगावस्था में वे निषादराज भरत के समतुल्य तथा संयोगावस्था में लखन सदृश सेवानुरक्त भक्त थे। अपने मति अनुरुप के प्रथम अंक २४⁄ ०७⁄ २०२०  में हमने यह भी बताया कि श्री भरत विष्णु अंशावतार और श्री लक्ष्मण जी शंकर अंशावतार थे, इन दोनों की सेवा भी विशेष थी।  इसी कारण मानसकार ने इसका कई स्थानों पर उल्लेख भी किया है–

''विरंचि संकर सेब्य जे''

ऐसे निषाद राज धन्य हैं। हमें उनके द्वारा बतलाए महामंत्र को भलीप्रकार अंगीकृत करना चाहिए।

समुझि मोरि करतूति कुलु, प्रभु महिमा जिय जोइ। जो न भजइ रघूबीर पद, जग बिधि बंचित सोइ।

-जय जय श्री सीताराम-

-जयंत प्रसाद

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  • प्रिय पाठक!  रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंग से जुड़े लेख प्रत्येक शनिवार प्रकाशित होंगे। लेख से सम्बंधित आपके विचार व्हाट्सप न0 लेखक- 9936127657, प्रकाशक-  8953253637 पर आमंत्रित हैं।
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