होमवीडियो LIVE
BREAKING
विज्ञापन

रामचरितमानस–: अंक-25 – मति अनुरुप – 'बरसि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्य पुंज कोउ नाहीं।'– जयन्त प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

sonbhadra

1:29 PM, Jan 23, 2021

Share:

Edited by: Ashish Gupta

रामचरितमानस–: अंक-25 – मति अनुरुप – 'बरसि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्य पुंज कोउ नाहीं।'– जयन्त प्रसाद
हमसे जुड़ने के लिए फॉलो करें:
Instagram
सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

- जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य - राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

श्री रामचरितमानस में निषाद राज के लिए और गंगा घाट के नाविक के लिए भी कहीं-कहीं केवट अर्थात एक ही संबोधन प्रयोग में लाया गया है। इस कारण सामान्यतः कुछ लोग केवट और निषादराज को एक ही समझ बैठते हैं, पर ऐसा नहीं है। गुह निषादों का और श्रृंगवेरपुर का स्वामी था, जबकि नाविक गंगा घाट का मल्लाह, जो निषादराज गुह के ही अधीन था। दोनों दो थे। यथा–

'उतरि ठाढ भए सुरसरि रेता। सीय राम गुह लखन समेता।

तब –

विज्ञापन

'केवट उतरि दण्डवत कीन्हा।'

यहां भी दो ही लक्षित हो रहे है, अन्यथा प्रभु को अपने मित्र, जो स्वयं को प्रभु का सेवक मानता है, से नाव हेतु निवेदन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। केवट की सेवा मात्र गंगा घाट तक ही थी, जबकि निषादराज की सेवा श्रृंगवेरपुर से आरंभ होकर चित्रकूट तक गई और यही निषादराज राम राज्याभिषेक में भी शामिल रहे।

Image

यदि घाट का मल्लाह निषादराज का कुटुम्बी सेवक था और निषादराज स्वयं प्रभु के साथ ही थे, तो मल्लाह ने नाव न लाने की ऐसी धृष्टता कैसे की? निषादराज ने उसे दण्डित क्यों नहीं किया। शायद यह नाविक निषादराज का स्वजन या कुटुम्बी ही था। निषादराज गुह को लक्ष्‍मण जी के द्वारा प्रभु का मर्म भी पता हो गया है। निषादराज प्रभु को अपने घर ले जा कर उनका चरणोदक भी नही ले सके। प्रभु द्वारा उनके आग्रह को विनय पूर्वक मना भी कर दिया है, यथा–

कृपा करिय पुर धारिय पाउ। थापिय जनु सब लोग सिहाउ। कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।

Image

अतः प्रभु के चरणोदक प्राप्ति की लालसा में यह तरकीब निषादराज की ही प्रतीत हो रही है, ताकि प्रभु का चरणोदक प्राप्त कर अपना और अपने कुल का उद्धार किया जा सके। इसके लिए नाविक से मिल– बैठ कर योजना बनाई है तथा इस दौरान उस नाविक को भी प्रभु का मर्म बोध करा दिया है। इसी कारण केवल मर्म जानने की बात करते हुए नाव लाने से मना कर देता है,  यथा–

माँगी नाव न केवट आना। कहइ तुम्हार मरमु मै जाना।

विज्ञापन

और प्रभु की अनुमति होते ही बड़े कठौती में पानी भर लाया, जिससे सामान्यतः यही समझ में आए कि लकड़ी की नाव बचाने की परीक्षा हेतु ही लकड़ी की कठौता पर परीक्षा की जा रही है–

केवट राम रजायसु पावा। पानि कठौता भरि लइ आवा।

बड़े कठौते में भर कर पानी इसलिए लाया कि चरणोदक परिवार के समस्त लोगों को पीने के लिए आसानी से पूर पड़े।

पद पखारि जलपान करि, आपु सहित परिवार। पितर पार करि प्रभुहि पुनि,मुदित गयउ लै पार।

Image

निषादराज की यही इच्छा (रुचि) थी कि –

कृपा करिय पुर धारिय पाउ।थापिय जनु सब लोग सिहाउ।

प्रभु सदैव अपने भक्तों की रुचि पूरी करते हैं–

विज्ञापन

'राम सदा सेवक रूचि राखी।'

और यहां भी भक्त निषाद की वह रुचि उसके ही कुटुंबी केवट के द्वारा पूरी हो रही है।

बरसि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्य पुंज कोउ नाहीं।

निषादराज को उनके परिजनों सहित बारम्बार प्रणाम।

जय जय श्री राम

  • प्रिय पाठक!  रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंग से जुड़े लेख प्रत्येक शनिवार प्रकाशित होंगे। लेख से सम्बंधित आपके विचार व्हाट्सप न0 लेखक- 9936127657, प्रकाशक-  8953253637 पर आमंत्रित हैं।

Click Here

to

विज्ञापन

Download

the

sonprabhat

mobile app from

Google Play Store

.   https://sonprabhat.live/15084/

पूर्व प्रकाशित रामचरितमानस अंक – मति अनुरूप–

सम्बंधित खबर

शहरी खबरें

और पढ़ें

Breaking से पहले Believing —
Son Prabhat News, since 2019

Follow Us:

Instagram

Download App

Play Store

Subscribe Now

Play StoreSonprabhat Live

© Copyright Sonprabhat 2026. All rights reserved.

Developed by SpriteEra IT Solutions