रामचरितमानस -: "रहत न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।"- मति अनुरूप- जयंत प्रसाद
सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)
sonbhadra
2:49 PM, Dec 26, 2020
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Edited by: Ashish Gupta

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)
- जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य - राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )
–मति अनुरूप–
ॐ साम्ब शिवाय नम:
श्री हनुमते नमः
रहत न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की। सुख सम्पति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।
जब श्री हनुमान जी ने प्रभु से सुग्रीव की मित्रता कराई तो लक्ष्मण जी द्वारा राम की कथा (सीता हरण) सुनकर सुग्रीव जी दुखी हो गए और अपनी सेवा प्रभु से निवेदन किया–
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहिं जानकी आई।
अर्थात् हे प्रभु मैं सब प्रकार से वह सेवा करूंगा, जिससे जानकी जी आपसे आ मिलें। सुग्रीव जी को सबसे बड़ी व्यथा बालि द्वारा अपनी पत्नी के हरण की है, इसी कारण वे राम से सीता को मिलाकर अपनी सबसे बड़ी सेवा समर्पित करना चाहते हैं, साथ ही ऐसा कह कर वे राम से अपनी पत्नी की प्राप्ति में सहायता का निवेदन संकेत करते हैं। जीव (सुग्रीव) का यही स्वभाव भी है, जब जीव के पास सांसारिक साधनों का अभाव होता है तो उसे भगवान याद आते हैं और भगवान से मिलने पर वह सांसारिक माया की ही याचना करता है।
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प्रभु ने प्रसन्न होकर सुग्रीव से वन में निवास का कारण पूछा, जिस पर सुग्रीव जी ने मायावी राक्षस की कथा विस्तार से बताते हुए सूनी सिंहासन पर मंत्रियों द्वारा जबरन बैठाने की बात कही। जीव इसी प्रकार अपने अधर्म में अपनी विवशता का राग अलापता है वर्ना भरत को तो कोई जबरन सिंहासन पर नहीं बैठा सका। बालि के बाद सिंहासन का अधिकारी तो अंगद था, जिसे अंततः अंगद को युवराज पद दिला कर बालि ने हासिल कर ही लिया। सुग्रीव ने कहा–
इहाँ सापबस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।
यहां यदि शाप वस वह नहीं आता तो डरने की कोई बात नहीं थी, पर जीव का यही स्वभाव है– जहां भय का कारण नहीं वहां भी भय करता है।

प्रभु ने कहा कि हे सुग्रीव बालि को मैं एक ही वाण से (सरलता से) मार डालूंगा और उसे ब्रह्मा व शंकर भी नहीं बचा सकते। अतः हे सखा– "सखा सोच त्यागहु बल मोरे।"
सुग्रीव केवल बल के भरोसे कैसे चिंता मुक्त होवें? बल से महाबली का मुकाबला भला कैसे होगा? यथा–
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबली अति रन धीरा।
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अतः सुग्रीव ने राम की परीक्षा ले ली। जब प्रभु श्री राम ने दुंदुभी राक्षस के अस्थि को पैर के अंगूठे से दस योजन दूर फेंक दिया और सातों तालवृक्षों को "बिनु प्रयास" सरलता से गिरा दिया। तब सुग्रीव को विश्वास हुआ और राम के बल को अमित बल समझा–
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।
जब सुग्रीव जी को यह ज्ञान हो गया कि ये साक्षात प्रभु है तो हर्षित हो भगवान के चरणों में गिर पड़ा और बोल पड़ा–
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सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।
क्योंकि– "ए सब राम भगति के बाधक।"
सुख, संपति, परिवार और बडाई, ये सब राम भक्ति में बाधक हैं। संयोग से बालि ने सुग्रीव से इन चारों को छीन लिया था तभी भगवान से मिलन संभव हुआ। इसी कारण सुग्रीव जी ने बालि को धन्यवाद किया–
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन विषादा।
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परंतु बालि वध के पश्चात जब सुग्रीव पुनः सिंहासनारूढ हो गया और पुनः सब कुछ मिल गया तो वह पुनः राम और उनकी सेवा (भक्ति) को भूल गया। जीव का यही स्वभाव है, पर ईश्वर जिसे अपना लेता है वह अपने स्वाभाविक स्वरूप में अवस्थित हो जाता है– उसके चूक पर प्रभु ध्यान नहीं देते।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा। रहत न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिय की।
सियावर रामचंद्र की जय
–जयंत प्रसाद

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