होमवीडियो LIVE
BREAKING
विज्ञापन

रामचरितमानस-: “सम्भु दीन्ह उपदेस हित, नहिं नारदहिं सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु, हरि इच्छा बलवान।“- मति अनुरुप- अंक 40. जयंत प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

sonbhadra

8:42 AM, Sep 18, 2021

Share:

Edited by: Ashish Gupta

रामचरितमानस-: “सम्भु दीन्ह उपदेस हित, नहिं नारदहिं सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु, हरि इच्छा बलवान।“- मति अनुरुप- अंक 40. जयंत प्रसाद
हमसे जुड़ने के लिए फॉलो करें:
Instagram
सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

- जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य - राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

सम्भु दीन्ह उपदेस हित, नहिं नारदहिं सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु, हरि इच्छा बलवान।

श्रीरामचरितमानस के नारद मोह प्रसंग में मानस के मुख्य वक्ता याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि–  हे भारद्वाज जी शिवजी का हितकारी उपदेश नारद को अच्छा नहीं लगा। प्रभु की इच्छा अत्यंत प्रबल है–

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।

विज्ञापन

यद्यपि की शिवजी ने अत्यंत विनम्रता पूर्वक नारद जी को उनके काम विजय का प्रसंग श्री हरि से न सुनाने का उपदेश दिया, पर नारद जी को यह बात अच्छी नहीं लगी–

बार–बार विनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायउ मोहीं।

तिमि जनि हरिहिं सुनायहु कबहूँ। चलेहु प्रसंग दुरापहु तबहूँ।

Image

सामान्यतः पाठक गण सोचते हैं कि आखिर शिवजी ने वह प्रसंग प्रभु को सुनाने से मना क्यों किया?  चौपाई में प्रयुक्त जिमि और तिमि शब्दो पर ध्यान देने से स्पष्ट है कि जिमि अर्थात जिस प्रकार या जिस शैली में अर्थात जिस प्रकार अहंकार पूर्वक आपने काम विजय की कथा हमें सुनाई, तिमि अर्थात उस प्रकार अहंकार पूर्वक प्रभु को यह कथा न सुनाना।  मोह ग्रसित नारद को यह नहीं सुहाया, सोचा कि स्वयं शिवजी तो काम विजयी बने बैठे हैं और मैंने उनकी बराबरी कर ली या उससे भी बड़ी तमगा हासिल कर ली अर्थात् शिवजी तो केवल काम पर विजय किए क्रोध पर नहीं, क्रोध में काम को जला डाला पर मैं तो काम को भी जीता और क्रोध भी नहीं किया, क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली तो शिवजी ईर्ष्या वश हमें यह प्रसंग सुनाने से मना कर रहे हैं। अतः बड़ी चालाकी से नारद जी शिवजी की बात रखने का दिखावा करते हुए ब्रह्मलोक चले गये।

सम्भु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब विरंचि के लोक सिधाए।

पर नारद से अधिक समय रहा नहीं गया और वे क्षीर सागर में परम प्रभु के पास पहुंचे।

Image

विज्ञापन

अहंकार उनके मुखमंडल पर स्पष्ट दिख रहा था। घमंडी व्यक्ति को यथार्थ बोध नहीं होता, भला देखें न,  जो नारद प्रभु के चरणों में स्थान पाने के लिए सदैव व्याकुल रहते थे और इसी को अपना परम लाभ समझते थे, वे प्रभु को प्रणाम करने की शिष्टता गवाँकर प्रभु की बराबरी करते हुए गले मिल रहे हैं–

"हरषि मिले उठि रमा निकेता।"

और मोहान्धता की हद तो तब हो गई जब प्रभु के चरणों में स्थान रखने वाला भक्त नारद प्रभु के साथ उनके आसन पर बैठ गये, कोई औपचारिक अभिवादन भी नहीं किया–

" बैठे आसन रिषिहिं समेता।"

प्रभु के यह कहने पर कि हे मुनिǃ आपने आज बहुत दिनों में दया की, नारद का घमंड और भी बढ़ गया और दम्भ में भरकर बिना पूछे ही कामदेव पर विजय की कथा आरंभ कर दी–

काम चरित नारद सब भाषे। जद्‍यपि प्रथम बरजि सिव राखे।

अति प्रचंड रघुपति कै माया। जो न मोह अस को जग जाया।

विज्ञापन

भला प्रभु की माया ने किस को भ्रमित नहीं किया?

Image

प्रभु ने नारद की बहुत बड़ाई की अब तो नारद को अपने अहंकार का भान हो जाना चाहिए था पर नारद की भारी अहंकार निद्रा नहीं टूटी। फिर प्रभु ने भक्त का समुचित उपचार ही करना उचित समझा और जिस नारद को काम और क्रोध को जीतने का घमंड था उसे विश्वमोहिनी का बंदर बनकर काम में नाचना पड़ा, और क्रोध तो ऐसा कि अपने आराध्य पर ही क्रोध कर उन्हें शाप दे डाला। हरि इच्छा अत्यंत बलवती है। हम माया ग्रसित जीवो की रक्षा मायापति भगवान सदैव करें–

जय जय श्री सीताराम

-जयंत प्रसाद

  • प्रिय पाठक! रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंग से जुड़े लेख प्रत्येक शनिवार प्रकाशित होंगे। लेख से सम्बंधित आपके विचार व्हाट्सप न0 लेखक- 9936127657, प्रकाशक- 8953253637 पर आमंत्रित हैं।

https://sonprabhat.live/26394/

Click Here

विज्ञापन

to

Download

the

sonprabhat

mobile app from

Google Play Store

.

सम्बंधित खबर

शहरी खबरें

और पढ़ें

Breaking से पहले Believing —
Son Prabhat News, since 2019

Follow Us:

Instagram

Download App

Play Store

Subscribe Now

Play StoreSonprabhat Live

© Copyright Sonprabhat 2026. All rights reserved.

Developed by SpriteEra IT Solutions