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रामचरितमानस-: "जेहि सरीर रति राम सो, सो आदरहिं  सुजान।रुद्र देह तजि नेह वस ,वानर भे हनुमान।" - मति अनुरूप- जयंत प्रसाद

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

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2:20 PM, Dec 5, 2020

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Edited by: Ashish Gupta

रामचरितमानस-: "जेहि सरीर रति राम सो, सो आदरहिं  सुजान।रुद्र देह तजि नेह वस ,वानर भे हनुमान।" - मति अनुरूप- जयंत प्रसाद
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सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

सोनप्रभात- (धर्म ,संस्कृति विशेष लेख)

- जयंत प्रसाद ( प्रधानाचार्य - राजा चण्डोल इंटर कॉलेज, लिलासी/सोनभद्र )

–मति अनुरूप–

ॐ साम्ब शिवाय नम:

श्री हनुमते नमः

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जेहि सरीर रति राम सो, सो आदरहिं  सुजान। रुद्र देह तजि नेह वस ,वानर भे हनुमान।

दोहावली के इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि ज्ञानी जन उसी शरीर का आदर करते हैं , जिस शरीर की रति अर्थात प्रेम राम से हो। शरीर चाहे जो भी हो।  मानस में सर्वत्र राम प्रेमी शरीर का आदर है, चाहे वह गीध,काक, वानर- भालू, केवट, कोल भील आदि जो भी हो।

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इसी कारण प्रेमवश शिवजी ने अपने शरीर का त्याग कर वानर (हनुमान)शरीर से अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त की। वानर जैसा अधम शरीर कि-

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प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

'अस मैं अधम सखा सुनु।'

राम रति के कारण इस शरीर का इतना आदर हुआ, और श्रीमुख से उस शरीर की बढ़ाई की गयी-

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनु धारी। व सुनु सुत तोहि  उरिन मै नाहीं। देखेउँ करि विचार मन माही।

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राम से प्रेम होने के कारण ही कपि संबोधित हनुमान को देव,नर और मुनि, तनु धारी अर्थात ये शरीर भी वैसा श्रेष्ठ नहीं, ऐसा कहा गया।  प्रथमत: तो कपि शरीर को देव नर मुनि से श्रेष्ठ कहते हुए पुनः  सुत कह कर उस शरीर को प्रतिष्ठा दी और अपने को कभी उऋण न हो सकने वाला ऋणिया घोषित किया। इस प्रकार यह सिद्ध है, कि अधम से अधम शरीर भी राम से प्रीति होने पर ज्ञानी जनों के मध्य आदरणीय हो जाता है। यही संकेत करते हुए शिव जी ने वानर (हनुमान) का शरीर ग्रहण कर लिया।

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रामचरितमानस में सर्वत्र शिवजी अपना आराध्य राम को और राम जी अपना आराध्य शिवजी को मानते हैं तथा दोनों में एक दूसरे को अपना आराध्य सिद्ध करने की होड़ सी लगी रहती है। साधारणतया यह स्पष्ट ही नहीं होता कि कौन किसका आराध्य है। ( इस पर पिछले अंकों में प्रकाश डाला जा चुका है।) मानस में गोस्वामी जी ने इस बात को बड़ी कुशलता से हर स्थान पर रखा है।  इस सन्दर्भ में प्रिय पाठक गणों का ध्यान मानस के मंगलाचरण की ओर ले जाना चाहता हूं। बालकांड से अरण्यकाण्ड तक मंगलाचरण में भगवान शिव के मंगलाचरण का श्लोक पहले और राम जी के बाद में रखा गया है,  परंतु किष्किंधा कांड में  जब शिवजी स्वयं हनुमान के रूप में राम सेवा में आ गये तो उनके दास्य भाव को ध्यान में रखते हुए राम जी के मंगलाचरण श्लोक पहले और शिवजी के मंगलाचरण का श्लोक बाद में व्यवस्थित किया गया है।

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शिवजी का राम से असीम प्रेम होने के कारण ही शिवजी ने हनुमान का  शरीर धारण किया और उनके वानर रूप को इतना सम्मान मिला कि मानस का एक सोपान (सुंदरकांड) ही हनुमान के नाम कर दिया गया । क्या कहें सुंदरकांड में तो राम के मंगलाचरण के पश्चात शिव जी के स्थान पर शिव के हनुमान रूप का ही प्रत्यक्ष मंगलाचरण किया गया। शिव के हनुमान रूप का इतना आदर राम रति के कारण ही हुआ।

सियावर रामचंद्र की जय

- जयंत प्रसाद

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