जिले के वरिष्ठ साहित्यकारों ने कवि गोष्ठी में दी एक से एक बढ़कर प्रस्तुति
विंध्य नगर बैढ़न में वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार सुरेश गुप्त ग्वालियरी के आवास पर एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें सीधी से पधारे सुविख्यात कवि एवं डिग्री कॉलेज में वनस्पति विज्ञान के
4:43 PM, Sep 30, 2026
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Edited By: Shaktipal , Reported By: Son prabhat live

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विंध्य नगर बैढ़न में वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार सुरेश गुप्त ग्वालियरी के आवास पर एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें सीधी से पधारे सुविख्यात कवि एवं डिग्री कॉलेज में वनस्पति विज्ञान के प्राध्यापक प्रदीप द्विवेदी सत्यव्रत, चिनगी टोला बरगवां के वरिष्ठ कवि शंकर प्रसाद शुक्ल पथिक, सिंगरौली के युवा ग़ज़ल कार संजीव कुमार पाठक सौम्य जी की विशेष उपस्थिति रही, गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रदीप द्विवेदी सत्यव्रत ने एवं संचालन संजीव कुमार पाठक सौम्य ने किया!!
मां वाणी वंदना के पश्चात कवि गोष्ठी का शुभारंभ करते हुए वरिष्ठ कवि शंकर प्रसाद शुक्ल पथिक जी ने "ताटंक" छंद में शिव वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को भक्ति मय बना दिया, बानगी देखिए..
भाल मयंक कंठ में विषधर, सिर पर सुरसरि धारा है!
कर में बाजे डमरू डम डम , ताप त्रिशूल निवारा है!
बाघम्बर आसन पर साजे, कोपि अनंगहि छारा है!
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सो प्रभु द्रवहु दास मै तेरा,
तू ही एक सहारा है!!
अब बारी थी युवा ग़ज़ल कार संजीव कुमार पाठक सौम्य जी का आपने प्रदूषण पर प्रहार करते हुए यह पंक्तियां प्रस्तुत की,
अब साफ नहीं गलियाँ, काँटो भरा शहर है!
बड़ी दूर खड़ी मंजिल, बड़ा प्रबल कहर है!
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है हर तरफ अंधेरा काला और घनेरा,
बड़ी विकट बनी गति, बढ़ा ये कलुष प्रहर है!!
अगले पायदान पर वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश गुप्त ग्वालियरी ने अपना सुप्रसिद्ध गीत प्रस्तुत किया जिसके बोल थे..
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खिड़कियों से झांकती निखरी किरण,
गुनगुनी धूप है छत पर चलो,
प्यार का है उम्र से क्या वास्ता,आँख में काजल लगा छत पर चलो!
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कुछ हम कहे कुछ तुम कहो,
अनकही बाते करें,छत पर चलो!
देह में गर्मी नहीं तो क्या हुआ,
सनसनी हम भी करे छत पर चलो!!
अब बारी थी आज की गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर प्रदीप द्विवेदी सत्यव्रत के काव्य पाठ का, आपने अनेक सवैया छंद जो कि राधा कृष्ण एवं मीरा के प्रेम पर आधारित थे प्रस्तुत किए, एक रचना जो कि हमारे प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का अवलोकन कराती है, बानगी देखिए,
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पर्वत पर्वत धुँआ उठ रहा, टूट रहा दम नदियों का!
जहर भर रहा प्राण वायु में, छूट रहा क्रम सदियों का!
उजड़ रहा श्रृंगार घटा का, भौतिक सुख संसाधन से!
धुंआ उड़ाती हँसे चिमनियां, गांव शहर के आंगन से!!
समापन करते हुए सुरेश गुप्त ग्वालियरी ने सभी उपस्थित कवि गण एवं उपस्थित श्रोता जनों का हार्दिक स्वागत करते हुए हृदय से आभार व्यक्त किया!!






