Sonbhadra News: दक्षिणांचल के जंगलों से विलुप्ति की ओर काला शीशम, साखू और सागौन पर भी संकट
म्योरपुर/ सोनभद्र | Prashant Dubey - सोन प्रभात न्यूज़
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7:41 PM, Feb 4, 2026
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Edited by: Son Prabhat

म्योरपुर/ सोनभद्र | Prashant Dubey - सोन प्रभात न्यूज़
बहुमूल्य वृक्षों और दुर्लभ जड़ी-बूटियों की विरासत समेटे दक्षिणांचल के घने जंगलों से काला शीशम अब विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुका है। अपनी अद्वितीय मजबूती, चमक और टिकाऊपन के लिए पहचाना जाने वाला यह वृक्ष यदि समय रहते संरक्षित नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह केवल इतिहास बनकर रह जाएगा। वन विभाग के जानकारों के अनुसार, म्योरपुर रेंज के गड़िया और डडीहरा के जंगलों में आज भी काले शीशम के कुछ वृक्ष दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी संख्या अब उँगलियों पर गिनने लायक ही बची है।
अतीत की हरियाली, आज की कमी
स्थानीय बुजुर्गों— 67 वर्षीय शिव कुमार, 98 वर्षीय शोभन यादव और 75 वर्षीय राजेंद्र —का कहना है कि अंग्रेज़ी दौर से लेकर 1984 तक गोहड़ा, घघरी, चौना, मनवसा, झापी पहरी, गड़िया और हाथी नाला जैसे इलाकों में काला शीशम प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। उस समय संपन्न और ज़मींदार वर्ग काले शीशम से बने फर्नीचर को ही शान और भरोसे का प्रतीक मानता था। हालांकि 1978 से 1982 के बीच जंगलों के ठेके दिए जाने के बाद अंधाधुंध कटान हुआ। परिणामस्वरूप काले शीशम का अस्तित्व तेज़ी से सिमटने लगा। जो पौधे बाद में तैयार हुए, वे कथित तस्करों की भेंट चढ़ते चले गए।

साखू और सागौन भी खतरे में
पूर्व प्रधान एवं पर्यावरण कार्यकर्ता रामेश्वर प्रसाद और रामवृक्ष बताते हैं कि सागौन इस क्षेत्र का प्राकृतिक वृक्ष नहीं है, जबकि साखू (साल) यहाँ की प्राकृतिक पहचान रहा है—और उसकी संख्या लगातार घट रही है। भले ही हर वर्ष लाखों सागौन पौधे लगाए जा रहे हों, लेकिन ग्रामीणों द्वारा उन्हें ईंधन के रूप में काटे जाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे।
नर्सरी में उम्मीद की किरण
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म्योरपुर रेंज के रेंजर जबर सिंह के अनुसार, पहले यह मान लिया गया था कि साखू प्राकृतिक रूप से उग आता है। लेकिन इस वर्ष नर्सरी में साखू के पौधे तैयार करने में सफलता मिली है—करीब 1100 पौधे जीवित हैं और उनकी रोपाई की जाएगी। इससे आने वाले समय में साखू के वृक्षों की संख्या बढ़ने की उम्मीद जगी है।
काला शीशम को मिलेगा बढ़ावा
प्रभागीय वनाधिकारी कमल कुमार ने बताया कि काले शीशम के संरक्षण और संवर्धन के लिए नर्सरी में पौध तैयार कराई जाएगी। साथ ही किसानों को काला शीशम लगाने के लिए जागरूक किया जाएगा, ताकि जंगलों के साथ-साथ खेतों में भी इसका विस्तार हो सके।

काला शीशम: मजबूती और शान का प्रतीक
काला शीशम अपनी अद्भुत मजबूती, टिकाऊ लकड़ी और गहरी भूरी-काली रंगत के लिए प्रसिद्ध है। इसकी महीन बनावट इसे दरवाज़े, खिड़कियाँ, अलमारियाँ और नक्काशीदार फर्नीचर के लिए पहली पसंद बनाती है। पानी और दीमक के प्रति प्रतिरोधक क्षमता के कारण इससे बना फर्नीचर वर्षों तक सुरक्षित और आकर्षक रहता है। यही वजह है कि काला शीशम केवल लकड़ी नहीं, बल्कि गुणवत्ता, विश्वसनीयता और आर्थिक महत्व का प्रतीक माना जाता है।






