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Sonbhadra News: 41वीं अंतरराज्यीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता की प्रथम संध्या पर सजी काव्य-निशा

काशी से आए कवियों ने बांधा समां। बीएचयू से आए शब्द-साधकों ने सोनभद्र की धरती पर बिखेरा उजास।

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6:53 PM, Feb 8, 2026

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Edited by: Ashish Gupta

Sonbhadra News: 41वीं अंतरराज्यीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता की प्रथम संध्या पर सजी काव्य-निशा
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सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

काशी से आए कवियों ने बांधा समां। बीएचयू से आए शब्द-साधकों ने सोनभद्र की धरती पर बिखेरा उजास।

(आशीष कुमार गुप्ता)

लिलासी कला, सोनभद्र:41वीं अंतरराज्यीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता के प्रथम संध्या अवसर पर राजा चंडोल इंटरमीडिएट कॉलेज, लिलासी कला परिसर में भव्य कवि गोष्ठी (काव्य-निशा) का आयोजन किया गया। खेल और साहित्य के इस अद्भुत संगम ने दर्शकों को यह एहसास कराया कि प्रतियोगिता केवल मैदान तक सीमित नहीं होती, बल्कि संस्कृति और संवेदना से जुड़कर समाज को नई दिशा देती है।

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कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के वंदन एवं बाबा राजा चंडोल के प्रति श्रद्धा निवेदन के साथ हुआ। मंच, श्रोता और शब्द—तीनों में एक आत्मीय कंपन महसूस किया गया। ग्रामीण परिवेश में सजी यह काव्य संध्या साहित्यिक गरिमा

और लोक-संवेदना का अनुपम उदाहरण बनी।

बीएचयू से आए कवियों का आत्मीय स्वागत, सोनभद्र की धरती ने दिया अपनत्व

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इस काव्य संध्या की गरिमा तब और बढ़ गई जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से आए युवा एवं स्थापित कवियों ने अपनी सशक्त रचनाओं से मंच को जीवंत कर दिया। सोनभद्र की गिरीवासी धरती ने इन शब्द-यात्रियों का खुले मन से स्वागत किया।

कवि गोष्ठी में काव्य पाठ करने वाले कवि एवं उनकी प्रस्तुति

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कवि शिवम सांवरा ने "हम पितृ धरोहर बेंचि दयों, मुलू चित्र तुम्हार धरो है अभी। " मंच का आगाज किया। अपनी कविता को तीखे लेकिन संवेदनशील शब्दों में रखा। अंकित मिश्रा (बीएचयू) अंकित की रचना में युवा मन का संघर्ष और आत्मसंवाद मुखर था— “ एक तहजीब थी जिस किसी से मिलो , हाथ पकड़े मगर यूं दबाए नहीं। " सरल शब्दों में गहरी बात कहने की शैली ने खूब तालियाँ बटोरीं। वैभव अवस्थी ने "सौ करोड़ हिन्दू हैं लेकिन हिंदुस्तान नहीं दिखता" पढ़कर लोगो को गंभीर सोच के लिए विवश किया। श्रोताओं ने खूब सराहा।   वत्सल रोहिल्ला ने अपने काव्य पाठ में पढ़ा “ करें हम इश्क की बाते कई साल मगर है एक मुसीबत वक्त कम है ” उनकी प्रस्तुति में गंभीरता और सौंदर्य का सुंदर मेल दिखा। श्रोताओं ने उनकी भाव-गंभीर अभिव्यक्ति को खूब सराहा। अभिनंदन (बीएचयू) अभिनंदन ने सामाजिक चेतना को स्वर दिया, उनकी पंक्तियों ने युवाओं को विशेष रूप से प्रभावित किया।   कमलेश जी (नगर उंटारी, झारखंड) कमलेश जी की प्रस्तुति में “खुशियाँ हो या ग़म क्या फर्क पड़ेगा, एक बेबस मजदूर के घर बढ़ेगा तो बढ़ेगा, सिर्फ उसका कर्ज बढ़ेगा। उनकी रचना ने समाज की सच्चाइयों को सहजता से उजागर किया। कवि यथार्थ विष्णु यथार्थ विष्णु ने अपनी मिट्टी से जुड़ी रचना से मंच को भावुक कर दिया— “हम सोनभद्र की सोंधी सोंधी मिट्टी से आते हैं।” इस कविता पर सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा। कवि आकाश कवि आकाश ने गीतात्मक अंदाज़ में मंच को संगीतमय कर दिया— “मन हजारों रंगों में रंगा, तन समाधि लगाता रहा।” उनके गीतों ने श्रोताओं को भाव और लय के प्रवाह में बहा दिया। डॉ. लखन राम जंगली (प्रबंधक) डॉ. लखन राम जंगली की प्रस्तुति ने लोक-संस्कृति की गहरी छाप छोड़ी— “संगी छहे बईठ बंसिया बजावे” और वोट केके देवे ननदों काव्य पाठ किया। उनकी रचना ने ग्रामीण संस्कृति और लोक-स्मृतियों को जीवंत कर दिया। आशीष कुमार गुप्ता (संपादक – सोन प्रभात) कवि आशीष कुमार गुप्ता के लिए यह मंच अत्यंत भावनात्मक रहा। उन्होंने कहा कि इसी परिसर से उनके शिक्षा जीवन और शिक्षण कार्य की शुरुआत हुई थी। " अपनों ने ओढ़ की जुबा परायों सी, कैसे कह दूं अपना अपना सा रहा” उनकी प्रस्तुति में स्मृति, कृतज्ञता और मिट्टी से जुड़ाव स्पष्ट झलका, जिसे श्रोताओं ने मुक्त कंठ से सराहा।   श्रोताओं की रही सक्रिय भागीदारी     कवि गोष्ठी के दौरान विद्यालय के छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, ग्रामीण जनों एवं दूर-दराज से आए साहित्य प्रेमियों की बड़ी उपस्थिति रही। हर रचना पर तालियों की गूंज और भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ इस बात का प्रमाण थीं कि कविता आज भी जनमानस की धड़कनों से जुड़ी है। खेल और संस्कृति का सुंदर संगम बना आयोजन की पहचान इस काव्य संध्या का आयोजन डॉ. लखन राम जंगली (प्रबंधक) के मार्गदर्शन में तथा राजा चंडोल बनवासी सेवा समिति, लिलासी कला, सोनभद्र के तत्वावधान में किया गया। आयोजन समिति द्वारा सभी कवियों एवं अतिथियों का सम्मान कर आभार व्यक्त किया गया। 41वीं अंतरराज्यीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता के साथ आयोजित यह कवि गोष्ठी न केवल साहित्यिक दृष्टि से सफल रही, बल्कि इसने यह भी सिद्ध किया कि सोनभद्र की धरती आज भी शब्दों, संवेदना और संस्कृति की मजबूत पहचान रखती है।

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