IGRS में शिकायत निस्तारित, लेकिन शिकायतकर्ता का सवाल—समस्या हल हुई या सिर्फ कागजों में?
सोनभद्र में IGRS निस्तारण की चमक के बीच एक शिकायत ने उठाए गंभीर सवाल, आवेदक का दावा—पूर्व सूचना के बिना ही कर दिया गया निस्तारण
muirpur
12:36 PM, Aug 17, 2026
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Edited By: Ashish Gupta , Reported By: Ashish Gupta

Photo : Sonprabhat News
म्योरपुर, सोनभद्र। जनशिकायतों के त्वरित और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार का IGRS पोर्टल आम नागरिकों के लिए उम्मीद की एक बड़ी व्यवस्था है। लेकिन जब पोर्टल पर शिकायत “निस्तारित” दिखाई दे और शिकायतकर्ता के मुताबिक उसकी मूल समस्या जस की तस बनी रहे, तो सवाल केवल एक शिकायत का नहीं, बल्कि निस्तारण की गुणवत्ता का भी बन जाता है।
ऐसा ही एक मामला सोनभद्र के म्योरपुर थाना क्षेत्र से सामने आया है। ग्राम आरंगपानी निवासी रामसुन्दर पुत्र आलियार ने घरेलू जमीन के विवाद को लेकर IGRS/CM हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई थी। दस्तावेज के अनुसार शिकायत की जांच म्योरपुर थाने के उपनिरीक्षक परमानन्द त्रिपाठी द्वारा की गई। जांच रिपोर्ट में दोनों पक्षों को एक ही परिवार का बताते हुए घरेलू जमीन के बंटवारे को लेकर विवाद का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में मारपीट और गाली-गलौज की घटना मौके पर प्रमाणित न होने की बात कही गई तथा दोनों पक्षों के विरुद्ध 13 अगस्त 2026 को धारा 126/135 बीएनएसएस के तहत कार्रवाई किए जाने का उल्लेख है।

लेकिन शिकायतकर्ता की कहानी इससे अलग
शिकायतकर्ता की ओर से दिए गए दूसरे पत्र में आरोप लगाया गया है कि मामले की मूल समस्या का समाधान हुए बिना ही शिकायत को निस्तारित कर दिया गया। पत्र में यह भी उल्लेख है कि पुलिस सहायता के लिए 112 पर सूचना दी गई थी और आवेदक ने कार्रवाई की मांग की थी।
यानी सरकारी रिकॉर्ड में कार्रवाई और शिकायतकर्ता के अनुभव के बीच अंतर दिखाई दे रहा है।
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सवाल—निस्तारण का मतलब सिर्फ रिपोर्ट लगाना या समस्या का समाधान?
IGRS व्यवस्था का उद्देश्य केवल शिकायत को किसी अधिकारी तक पहुंचाना नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता की समस्या का गुणवत्तापूर्ण समाधान सुनिश्चित करना है। उत्तर प्रदेश सरकार के जनसुनवाई पोर्टल पर भी शिकायत की स्थिति देखने, निर्धारित समय में समाधान न होने पर अनुस्मारक भेजने और निस्तारण के संबंध में शिकायतकर्ता की प्रतिक्रिया दर्ज कराने की व्यवस्था दी गई है।

ऐसे में इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या शिकायतकर्ता को वास्तविक राहत मिली?
क्या उसकी मूल समस्या का समाधान हुआ?
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और यदि शिकायतकर्ता को निस्तारण की जानकारी ही नहीं दी गई या वह निस्तारण से संतुष्ट नहीं है, तो शिकायत को “निस्तारित” मानने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है?
IGRS में बेहतर रैंकिंग के बीच गुणवत्ता की परीक्षा
सोनभद्र पुलिस को मई 2026 में IGRS शिकायत निस्तारण में प्रदेश में प्रथम स्थान मिलने की रिपोर्ट सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार जिले के 20 थानों ने 100 में से 100 अंक हासिल किए थे।
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वहीं जून 2026 में जिलाधिकारी स्तर पर भी IGRS शिकायतों के गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध निस्तारण की समीक्षा किए जाने की खबर सामने आई थी।
ऐसे में आरंगपानी के इस मामले को एक टेस्ट केस की तरह देखा जा सकता है। रैंकिंग और आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन किसी एक शिकायतकर्ता के लिए असली सफलता तभी है जब उसकी समस्या वास्तव में खत्म हो।
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अब जरूरत जवाब की
इस मामले में संबंधित अधिकारियों से यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि शिकायतकर्ता की मूल समस्या क्या थी, मौके पर क्या कार्रवाई हुई, शिकायतकर्ता को निस्तारण की जानकारी कब और कैसे दी गई तथा शिकायतकर्ता की असंतुष्टि के बाद क्या पुनः जांच या समाधान की कोई प्रक्रिया अपनाई गई।
क्योंकि IGRS में “निस्तारित” लिखा जाना प्रशासनिक आंकड़ा हो सकता है, लेकिन आम नागरिक के लिए असली निस्तारण वही है—जब उसकी समस्या वास्तव में समाप्त हो।
सोन प्रभात की पड़ताल का सवाल:
“कागज पर निस्तारण या जमीन पर समाधान?”
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30 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने वाले शिक्षक हैं रामसुन्दर
इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता रामसुन्दर के सामाजिक और शैक्षिक योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्थानीय जानकारी के अनुसार रामसुन्दर पिछले 30 वर्षों से अधिक समय से शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने का कार्य भी करते रहे हैं। ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्र के लोगों के बीच शैक्षिक जागरूकता बढ़ाने में उनकी लंबे समय से भूमिका रही है।
ऐसे में एक शिक्षक और लंबे समय से समाज के बीच शिक्षा की अलख जगाने वाले व्यक्ति की शिकायत यदि IGRS जैसे महत्वपूर्ण जनसुनवाई मंच पर दर्ज होती है, तो उसके निस्तारण की पारदर्शिता, वास्तविकता और शिकायतकर्ता की संतुष्टि पर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी हो जाता है।

रामसुन्दर का सवाल केवल व्यक्तिगत विवाद के समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जिसमें शिकायतकर्ता के अनुसार समस्या का वास्तविक समाधान हुए बिना शिकायत निस्तारित कर दी जाती है। हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों में पुलिस की ओर से मौके पर जांच और कार्रवाई किए जाने का उल्लेख है, लेकिन शिकायतकर्ता की ओर से प्रस्तुत पत्र में असंतोष और कार्रवाई की मांग बनी हुई दिखाई देती है।






