होमवीडियो LIVE
BREAKING
विज्ञापन

गोंडवाना की अस्मिता और रानी दुर्गावती: क्या हम अपने इतिहास से दूर होते जा रहे हैं? - संपादकीय

आज सोनभद्र सहित देश के कई हिस्सों में रानी दुर्गावती को श्रद्धांजलि दी जा रही है। विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों और गोंड समाज के बीच यह दिन केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और गौरव को पुनः स्थापित करने का दिन भी है।

sonbhadra

12:21 PM, Jun 24, 2026

Share:

Edited By: Ashish Gupta , Reported By: Ashish Gupta

गोंडवाना की अस्मिता और रानी दुर्गावती: क्या हम अपने इतिहास से दूर होते जा रहे हैं? - संपादकीय

Photo : Sonprabhat News

हमसे जुड़ने के लिए फॉलो करें:
Instagram
सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

भारत का इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जिन्होंने अपने स्वाभिमान, संस्कृति और स्वतंत्रता के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। ऐसे ही नामों में एक नाम है – रानी दुर्गावती।

24 जून का दिन केवल इतिहास की एक तारीख नहीं है। यह उस स्वाभिमान की स्मृति है जिसने सत्ता के सामने झुकने से इंकार कर दिया। यह उस वीरता का प्रतीक है जिसने पराजय स्वीकार की, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं। यह दिन है गोंडवाना की महान वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान का।

आज सोनभद्र सहित देश के कई हिस्सों में रानी दुर्गावती को श्रद्धांजलि दी जा रही है। विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों और गोंड समाज के बीच यह दिन केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और गौरव को पुनः स्थापित करने का दिन भी है। लेकिन एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—

क्या हम वास्तव में रानी दुर्गावती को जानते हैं?

Image

अधिकांश लोग उन्हें केवल एक वीरांगना के रूप में याद करते हैं जिन्होंने मुगलों के विरुद्ध युद्ध किया था। परंतु उनका व्यक्तित्व इससे कहीं बड़ा था। वे एक कुशल प्रशासक, दूरदर्शी शासक और जनकल्याण को प्राथमिकता देने वाली नेतृत्वकर्ता थीं। उन्होंने उस दौर में शासन किया जब महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अपवाद मानी जाती थी।

विज्ञापन

आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तब रानी दुर्गावती का जीवन हमारे सामने एक जीवंत उदाहरण के रूप में खड़ा दिखाई देता है। उन्होंने यह साबित किया कि नेतृत्व का संबंध लिंग से नहीं, बल्कि साहस, निर्णय क्षमता और जनहित के प्रति समर्पण से होता है।

सोनभद्र का भूगोल और सामाजिक संरचना भी गोंडवाना की ऐतिहासिक विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है। यहां की आदिवासी संस्कृति, परंपराएं और सामाजिक स्मृतियां हमें बार-बार उस इतिहास की ओर ले जाती हैं जिसे मुख्यधारा की पुस्तकों में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। यही कारण है कि जब आज सोनभद्र के विभिन्न क्षेत्रों में रानी दुर्गावती को श्रद्धांजलि दी जाती है, तो यह केवल एक कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का प्रयास भी होता है।

दुर्भाग्य से आधुनिक पीढ़ी का इतिहास से संवाद लगातार कमजोर हो रहा है। सोशल मीडिया के दौर में हम इतिहास को कुछ पंक्तियों, कुछ पोस्टरों और कुछ नारों तक सीमित कर देते हैं। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे महान व्यक्तित्वों के जीवन, उनके संघर्ष और उनके विचारों को गहराई से समझें।

हर साल 24 जून को हम उनका बलिदान दिवस मनाते हैं। लेकिन क्या हम वास्तव में जानते हैं कि यह दिन क्यों महत्वपूर्ण है?

क्या रानी दुर्गावती केवल एक योद्धा थीं या उससे कहीं अधिक?

मैंने विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, शोध लेखों और उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन किया। जितना पढ़ता गया, उतना महसूस हुआ कि रानी दुर्गावती की कहानी केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि नेतृत्व, स्वाभिमान और अदम्य साहस की कहानी है।

विज्ञापन

Image

कालिंजर से गोंडवाना तक

5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर दुर्ग में जन्मी दुर्गावती चंदेल वंश से थीं। बचपन से ही उन्हें घुड़सवारी, तीरंदाजी और युद्ध कौशल का प्रशिक्षण मिला। उस दौर में जब अधिकांश राजकुमारियों को महलों की सीमाओं में रखा जाता था, दुर्गावती युद्ध और प्रशासन दोनों की शिक्षा ले रही थीं। उनका विवाह  गोंडवाना के राजा संग्राम शाह के पुत्र राजकुमार दलपत शाह से हुआ। यह विवाह केवल दो परिवारों का नहीं बल्कि दो संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक था। लेकिन नियति ने जल्दी ही परीक्षा ले ली। दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद राज्य की जिम्मेदारी दुर्गावती के कंधों पर आ गई। उनका पुत्र वीर नारायण उस समय बहुत छोटा था।

एक महिला शासक, जिसने बदल दी शासन की परिभाषा

अक्सर इतिहास में महिला शासकों को केवल युद्धों के संदर्भ में याद किया जाता है, लेकिन रानी दुर्गावती की सबसे बड़ी शक्ति उनका प्रशासन था। उन्होंने गोंडवाना को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया। तालाब बनवाए।सिंचाई व्यवस्था विकसित की।व्यापार को बढ़ावा दिया।जनकल्याण को प्राथमिकता दी। आज भी मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में उनके नाम से जुड़े जलाशय और स्मृतियां मिलती हैं। यही कारण था कि गोंडवाना केवल एक राज्य नहीं बल्कि एक समृद्ध और आत्मनिर्भर क्षेत्र बन गया।

अकबर का विस्तार और गोंडवाना की चुनौती

विज्ञापन

16वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। सम्राट अकबर की नीति केवल सैन्य विजय तक सीमित नहीं थी। वह भारत के विभिन्न क्षेत्रों को अपने प्रभाव में लाना चाहते थे। गोंडवाना की समृद्धि और रणनीतिक महत्व ने मुगल दरबार का ध्यान आकर्षित किया। 1564 में अकबर के सेनापति आसफ खान को गोंडवाना पर आक्रमण का दायित्व सौंपा गया। यह युद्ध केवल भूमि का युद्ध नहीं था। यह स्वतंत्रता और अधीनता के बीच का संघर्ष था।

नर्रई घाटी का वह निर्णायक दिन

24 जून 1564। मध्य भारत की नर्रई घाटी। एक ओर विशाल मुगल सेना। दूसरी ओर रानी दुर्गावती और उनके सीमित संसाधन। इतिहास बताता है कि परिस्थितियां उनके पक्ष में नहीं थीं। लेकिन उन्होंने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। रानी स्वयं युद्धभूमि में उतरीं। घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सेना का नेतृत्व किया। उनके पुत्र वीर नारायण भी युद्ध में शामिल थे। युद्ध भयंकर था। मुगल सेना संख्या और संसाधनों में कहीं अधिक शक्तिशाली थी। फिर भी रानी की सेना ने ऐसा प्रतिरोध किया जिसे इतिहास आज भी याद करता है।

वह क्षण जिसने उन्हें अमर बना दिया

युद्ध के दौरान रानी दुर्गावती गंभीर रूप से घायल हो गईं। इतिहासकारों के अनुसार उनके साथियों ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास किया। कुछ ने आत्मसमर्पण का सुझाव भी दिया। लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने निर्णय लिया कि जीवन से बड़ा स्वाभिमान है। उन्होंने शत्रु के हाथों बंदी बनने की बजाय अपने प्राणों का बलिदान देना चुना। यही वह क्षण था जिसने उन्हें केवल एक रानी नहीं, बल्कि अमर वीरांगना बना दिया।

आज के भारत के लिए उनकी कहानी क्यों महत्वपूर्ण है?

विज्ञापन

आज जब हम नेतृत्व, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, तब रानी दुर्गावती का जीवन इन सभी मूल्यों का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आता है। उन्होंने साबित किया कि नेतृत्व लिंग नहीं देखता। उन्होंने दिखाया कि सत्ता का अर्थ केवल शासन करना नहीं, बल्कि लोगों के लिए खड़ा होना है। उन्होंने सिखाया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, आत्मसम्मान की रक्षा सर्वोपरि है।

इतिहास की किताबों से बाहर निकलने की जरूरत

एक पत्रकार और शोधकर्ता के रूप में मुझे लगता है कि रानी दुर्गावती जैसी विभूतियों को केवल एक स्मृति दिवस तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उनकी कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए। स्कूलों में।कॉलेजों में।डिजिटल मीडिया पर।डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में। क्योंकि यह केवल अतीत नहीं है। यह भारत के चरित्र का हिस्सा है।

अंतिम शब्द

24 जून केवल एक तारीख नहीं है। यह उस निर्णय की याद है जिसमें एक रानी ने साम्राज्य से नहीं, आत्मसमर्पण से लड़ाई लड़ी। यह उस साहस की कहानी है जिसने मृत्यु को स्वीकार किया, पर पराधीनता को नहीं। आज रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर उन्हें शत-शत नमन। इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए वह सदैव साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा बनी रहेंगी। जय वीरांगना रानी दुर्गावती।

सम्बंधित खबर

शहरी खबरें

और पढ़ें

Breaking से पहले Believing —
Son Prabhat News, since 2019

Follow Us:

Instagram

Download App

Play Store

Subscribe Now

Play StoreSonprabhat Live

© Copyright Sonprabhat 2026. All rights reserved.

Developed by SpriteEra IT Solutions