निषाद समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग तेज, राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री तक भेजा गया ज्ञापन.
मझवार, तुरैहा समेत निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप, बिंद सहित कई जातियों को एससी प्रमाणपत्र जारी करने की उठी मांग, 2016-17 के शासनादेशों के प्रभावी अनुपालन की अपील
sonbhadra
1:27 PM, Jul 28, 2026
Share:
Edited By: Ashish Gupta , Reported By: Anil Agrahari

Photo : Sonprabhat News
डाला, सोनभद्र | उत्तर प्रदेश में मझवार, तुरैहा तथा उनसे संबंधित निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप, कहार, धीमर, बिंद, बाथम, तुरहा, गोड़िया, मांझी और मछुआ समेत अन्य जातियों को अनुसूचित जाति (एससी) का प्रमाणपत्र जारी किए जाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। इसी क्रम में मंगलवार को निजात पार्टी के पदाधिकारियों एवं निषाद समाज के प्रतिनिधियों ने समाज कल्याण राज्य मंत्री संजीव सिंह गौड़ को उनके आवास पर ज्ञापन सौंपकर इस विषय में हस्तक्षेप की मांग की।
ज्ञापन महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, सभी जिलाधिकारियों एवं उपजिलाधिकारियों को संबोधित करते हुए सौंपा गया। इसमें मांग की गई कि संबंधित जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की जाए।
शासनादेशों के पालन की उठी मांग
ज्ञापन में कहा गया कि कार्मिक अनुभाग-2 की अधिसूचना संख्या 4(1)/2002-का-2 दिनांक 31 दिसंबर 2016 तथा 1/2017/4(1)/2002-का-2 दिनांक 12 जनवरी 2017 के तहत उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 में संशोधन किया गया था। इसके अनुसार निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप, कहार, धीमर, बिंद, बाथम, तुरहा, गोड़िया, मांझी एवं मछुआ जातियों को पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सूची से हटाने का उल्लेख किया गया है।
विज्ञापन

प्रतिनिधियों का आरोप है कि इन शासनादेशों के बावजूद प्रदेश के कई जिलों और तहसीलों में आज भी इन समुदायों के लोगों को ओबीसी प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं, जो शासनादेशों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का दिया हवाला
विज्ञापन
ज्ञापन में 10 अगस्त 1950 की राष्ट्रपति अधिसूचना, 1961 की जनगणना पुस्तिका, 29 अगस्त 1977 के भारत सरकार के शासनादेश तथा विभिन्न राजस्व परिषद अभिलेखों का उल्लेख करते हुए दावा किया गया कि मझवार, तुरैहा एवं उनकी पर्यायवाची जातियां अनुसूचित जाति समूह में सूचीबद्ध हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि देश के कई राज्यों में इन जातियों को अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है।
सरकार से की गई प्रमुख मांगें
यह भी पढ़ें
ज्ञापन में प्रदेश सरकार से मांग की गई कि वर्ष 2016 एवं 2017 के शासनादेशों का पूरे उत्तर प्रदेश में प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए। संबंधित जातियों को ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर रोक लगाते हुए पात्र व्यक्तियों को अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र जारी किए जाएं तथा उन्हें एससी वर्ग के अंतर्गत मिलने वाली सभी संवैधानिक सुविधाएं और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध कराया जाए।
विज्ञापन
इसके अतिरिक्त उत्तराखंड की तर्ज पर उत्तर प्रदेश विधानसभा में आवश्यक अध्यादेश, शासनादेश अथवा विधेयक लाकर मझवार, तुरैहा एवं तरमाली पासी समूह की पर्यायवाची जातियों की स्पष्ट परिभाषा तय करने तथा संबंधित जातियों को अनुसूचित जाति के आरक्षण में समायोजित करने की भी मांग की गई। साथ ही सभी उपजिलाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया।

शीघ्र निर्णय की मांग
विज्ञापन
प्रतिनिधियों ने कहा कि इस विषय पर जल्द निर्णय लेकर प्रदेशभर में एक समान व्यवस्था लागू की जाए, ताकि संबंधित समुदायों को उनके अनुसार संवैधानिक अधिकार एवं प्रमाणपत्र प्राप्त हो सकें।
ज्ञापन सौंपने के दौरान जिलाध्यक्ष अनिकेत निषाद, प्रदेश महासचिव दयाशंकर निषाद, जिला संयोजक शिवेंद्र निषाद, छोटेलाल साहनी, राम सुंदर, मुनिया देवी, पिंटू, प्रदीप, फूलचंद चौधरी, विनय, राकेश, लाल साहब, लाल जी, विनोद चौधरी, राज नारायण सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे।
नोट: ज्ञापन में किए गए ऐतिहासिक एवं कानूनी दावों का उल्लेख संबंधित पक्ष द्वारा प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर किया गया है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित सरकारी अभिलेखों एवं सक्षम प्राधिकरण द्वारा की जानी शेष है।






