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गढ़वा जिला: ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध

गढ़वा अपनी प्राचीन धार्मिक स्थलों के लिए भी विख्यात है। जिले में स्थित बाबा खोनहार नाथ मंदिर (गिजना) भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है। इस शिवलिंग की विशिष्टता यह है कि यहाँ जल चढ़ाने (अर्घ्य) की रस्म पूर्व दिशा में की जाती है – दुनिया भर में ऐसा केवल तीन स्थानों पर देखा गया है, जिसमें गिजना का शिवलिंग तीसरे स्थान पर है (अन्य दो मानसरोवर और अमरनाथ)

garhwa

1:20 PM, Apr 5, 2026

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Edited by: Son Prabhat

, Reported By: Ashish Gupta

गढ़वा जिला: ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध

Garhwa JH History : Image : Ai

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सोन प्रभात लाइव न्यूज़ डेस्क

Written By - Ashish Gupta (Editor Sonprabhat News) 

झारखंड के पलामू संभाग का गढ़वा जिला 1 अप्रैल 1991 को पलामू जिले के विभाजन से बना। जिले का मुख्यालय गढ़वा नगर में है। गढ़वा नाम अपने क्षेत्र के प्राचीन किलों (गढ़ों) की झलक देता है। अंग्रेजी शासन के दौरान 6 मई 1924 को ‘गांव प्रशासन अधिनियम, 1922’ के तहत गढ़वा यूनियन बोर्ड की स्थापना की गई थी, जिसने नगर विकास की नींव रखी। वर्तमान में गढ़वा जिला 3 उप-मंडलों (गढ़वा, नगर उंटारी और रंका) तथा 20 प्रखंडों में बँटा हुआ है

गढ़वा की भौगोलिक स्थिति इसे समृद्ध बनाती है। यह जिला 23°60’ से 24°39’ उत्तरी अक्षांश तथा 83°22’ से 84°00’ पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है। जिले की नदियाँ कृषिकार्य को जीवनदायिनी बनाती हैं: कोयल नदी इसकी पूर्वी सीमा और सोने नदी उत्तरी सीमा पर बहती है। वहीं कंहर नदी दक्षिण-पूर्वी सीमा पर लगभग 80 कि.मी. तक बहकर क्षेत्र की सिंचाई योग्य भूमि को समृद्ध करती है। इसके अलावा 3,819 फीट ऊँचे गुलगुलपाथ पर्वत (बंदरिया प्रखंड) कोयलेखन पर्वत श्रृंखला में छठे स्थान का सर्वोच्च बिंदु है

गांवों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में भी जिले में प्रगति हो रही है। 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उद्घाटित अंराज बांध, जिले की सिंचाई योजनाओं का अहम हिस्सा है। हाल ही में जिला प्रशासन ने गढ़वा के मझियाॉन प्रखंड में खजूरी बांध को मत्स्य पालन एवं पर्यटन के लिए विकसित करने की योजना बनाई है। इस परियोजना से बोटिंग सुविधा, सड़क निर्माण और प्राकृतिक सौंदर्यीकरण के माध्यम से स्थानीय रोजगार एवं आय सृजन में वृद्धि की उम्मीद है। इसी दिशा में मत्स्यपालन को बढ़ावा देने के लिए अंराज बांध में भी पनापुष्प (केज) परियोजना लागू हो रही है

इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत भी विविध है। प्रारंभिक ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार प्राचीन काल में क्षेत्र पर नंद, मौर्य और गुप्त राजवंशों का शासन था। मध्ययुग में नागवंशी, पाल और छेड़ो राजाओं ने यहाँ शासन किया। मुग़लकाल में अकबर के शासनकाल में 1574 में राजपूत राजा मानसिंह ने पलामू (गढ़वा सहित) क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया था। इन विभिन्‍न कालों के विरासत में गढ़वा की भाषा-साहित्य, किलें-टोटे और त्यौहारों में विविधता झलकती है।

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नगर-उंटारी (श्री बंसिधर नगर) गढ़वा का प्रमुख उप-मंडल है और विभिन्न पूजा-पाठ व पर्यटन स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ स्थित बंसीधर (वर्षिधर) मठ में राधा-कृष्ण की सोने की प्राचीन मूर्तियाँ रखी हैं, जिनका वजन लगभग 32 ‘मंड’ (लघु टन) बताया जाता है। अनेकों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा और शहरी विकास ने नगर-उंटारी को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है।

सांख्यिकी दृष्टि से गढ़वा जिला मुख्यतः ग्रामीण है। 2011 की जनगणना में जिले की कुल जनसंख्या 13,22,784 पाई गई, जिसमें अनुसूचित जाति की जनसंख्या 24.2% और अनुसूचित जनजाति 15.6% है। जिले की साक्षरता दर लगभग 60.3% और लिंगानुपात 933 महिला प्रति 1000 पुरुष है। कृषि-जीवन पर आधारित अर्थव्यवस्था के कारण पलायन की प्रवृत्ति रही है, लेकिन हाल की विकास योजनाओं से ग्रामीण गरीबों को स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ने की आशा है।

गढ़वा जिला अपनी प्राचीन गढ़ों, मंदिरों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यहाँ के बाबा खोनहार नाथ मंदिर और गढ़देवी मंदिर धार्मिक आस्था के केन्द्र हैं, सातबहिनी जलप्रपात और गुरु सिंधु झरने प्रकृति प्रेमियों को खींचते हैं, तथा रंका राजमहल ऐतिहासिक स्मारक के रूप में महत्वपूर्ण है। आधुनिक विकास परियोजनाएँ भी जिले को समृद्ध बनाने की दिशा में हैं। गढ़वा का समग्र स्वरूप – महाभारत काल से जुड़ी परंपराएँ, मध्यकालीन शासकों का प्रभाव और आधुनिक प्रयास – इसे एक समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गढ़ बनाते हैं।

स्रोत: गढ़वा जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट और जनगणना तथ्यांक.

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