यूपी पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट सख्त, ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने पर उठाए सवाल.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनावों में देरी और प्रशासकों की नियुक्ति संवैधानिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि पूर्व में पारित न्यायिक आदेशों की अनदेखी कर प्रशासकों की नियुक्ति की गई है, तो यह न्यायालय के आदेशों के उल्लंघन का विषय हो सकता है।
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8:36 PM, Jun 26, 2026
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Edited By: Ashish Gupta , Reported By: Social Desk

Photo : Sonprabhat News
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से चुनाव प्रक्रिया पर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखने की व्यवस्था पर गंभीर आपत्ति जताई और कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर लंबे समय तक प्रशासकों की नियुक्ति उचित नहीं मानी जा सकती।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनावों में देरी और प्रशासकों की नियुक्ति संवैधानिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि पूर्व में पारित न्यायिक आदेशों की अनदेखी कर प्रशासकों की नियुक्ति की गई है, तो यह न्यायालय के आदेशों के उल्लंघन का विषय हो सकता है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह ओबीसी आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट, आयोग के गठन का पूरा विवरण तथा पंचायत चुनाव कराने की प्रस्तावित समय-सीमा शपथपत्र के माध्यम से अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। न्यायालय ने इसे सरकार के लिए अंतिम अवसर बताया है।
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यह मामला सहारनपुर निवासी अरविंद राठौर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के आदेश को निरस्त कर जल्द से जल्द त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने की मांग की गई है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है। इसके बाद राज्य सरकार ने 25 मई को जारी आदेश के तहत मौजूदा ग्राम प्रधानों को सीमित अवधि के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया था। इसी निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।
मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को दोपहर 2 बजे निर्धारित की गई है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार अदालत के समक्ष चुनाव कार्यक्रम और ओबीसी आरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट किस रूप में प्रस्तुत करती है।
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उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव मूल रूप से मई 2026 में प्रस्तावित थे, लेकिन मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन में देरी होने के कारण चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची 12 जून 2026 को प्रकाशित की गई। इसी बीच अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तय करने के लिए राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया और उसे जिलावार सामाजिक एवं आर्थिक सर्वेक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए छह महीने का समय दिया।
आयोग के गठन के बाद सरकार ने अंतरिम व्यवस्था के तहत मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने का आदेश दिया था। हालांकि इस व्यवस्था को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग से रिपोर्ट शीघ्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता जताई और नवंबर-दिसंबर तक का समय काफी लंबा बताया।
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यदि ओबीसी आयोग की अंतिम रिपोर्ट वर्ष के अंत तक आती है, तो उसके बाद आरक्षण निर्धारण, अधिसूचना और चुनावी प्रक्रिया पूरी करने में अतिरिक्त समय लगेगा। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराना प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। प्रदेश में ग्राम प्रधानों के 57 हजार से अधिक पदों के साथ-साथ 75 जिला पंचायतों और सभी क्षेत्र पंचायतों के चुनाव भी एक साथ कराए जाने हैं।
Source : NDTV Hindi






