“सोनभद्र जल रहा है : हर साल की आग, हर बार की खामोशी” - संपादकीय
सोनभद्र के जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि यहां एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र जीवित है। जब आग लगती है, तो पेड़-पौधों के साथ-साथ अनगिनत वन्यजीव भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। उनकी पीड़ा न तो समाचार बनती है और न ही किसी बहस का विषय।
sonbhadra
4:30 PM, Apr 23, 2026
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Edited by: Ashish Gupta
, Reported By: Ashish Gupta

Image : Ai Generated
“सोनभद्र जल रहा है… पहाड़ों की सांसों में धुआं है, जंगलों की आंखों में आग है…” — यह कोई साहित्यिक कल्पना नहीं, बल्कि आज की सच्चाई है। हर साल गर्मी के आते ही सोनभद्र के जंगलों और पहाड़ियों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। यह एक ऐसा चक्र बन चुका है, जो हर वर्ष दोहराया जाता है—और हर बार हम इसे सामान्य मानकर आगे बढ़ जाते हैं।
गर्मी के बढ़ते तापमान, सूखी वनस्पतियां और मानवीय लापरवाही मिलकर इस आग को जन्म देते हैं। दोपहर की चिलचिलाती धूप में एक छोटी सी चिंगारी भी विनाश का कारण बन जाती है। यह आग धीरे-धीरे जंगलों को अपनी गिरफ्त में लेती है और फिर आसपास के गांवों तक डर और नुकसान का दायरा बढ़ा देती है। सवाल यह है कि क्या हम इसे सिर्फ “प्राकृतिक घटना” मानकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं?
“हर साल यही कहानी है, हर साल यही हाल, जंगल जलते रहते हैं… और हम रहते हैं खामोश बेहाल।” यह पंक्तियां केवल भाव नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक उदासीनता का आईना हैं।
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Ashish Gupta (Editor Sonprabnhat News) : Image -AI
सोनभद्र के जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि यहां एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र जीवित है। जब आग लगती है, तो पेड़-पौधों के साथ-साथ अनगिनत वन्यजीव भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। उनकी पीड़ा न तो समाचार बनती है और न ही किसी बहस का विषय। “जंगल जब जलता है, तो सिर्फ लकड़ी नहीं, एक पूरी दुनिया राख हो जाती है…” — यह सच्चाई हमें समझनी होगी।
ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर और भी गंभीर होता है। खेतों के किनारे लगी आग फसलों को नष्ट कर देती है, जिससे किसानों की साल भर की मेहनत पल भर में खत्म हो जाती है। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि मानसिक आघात भी है, जो लंबे समय तक बना रहता है।
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इसके साथ ही, आधुनिक जीवनशैली भी इस संकट को बढ़ाने में योगदान दे रही है। बिजली के उपकरणों का अत्यधिक उपयोग, पुराने तार और ओवरलोडिंग कई बार आग का कारण बनते हैं। यानी खतरा केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर घर, हर गांव और हर शहर तक फैल चुका है।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर यह हर साल क्यों होता है? क्या यह सिर्फ मौसम की देन है, या हमारी लापरवाही और अनदेखी इसका मुख्य कारण है? जंगलों में फेंकी गई जलती बीड़ी, खेतों को साफ करने के लिए लगाई गई आग, या छोटी-छोटी असावधानियां—ये सभी मिलकर एक बड़े संकट को जन्म देती हैं।
“आग खुद नहीं फैलती, हम उसे रास्ता देते हैं…” — यह पंक्ति हमें चेतावनी देती है कि जिम्मेदारी हमारी है, और समाधान भी हमारे ही हाथ में है।
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आज सोनभद्र धुएं की चादर में लिपटा हुआ है। पहाड़ सुलग रहे हैं, जंगल राख हो रहे हैं, और हम एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं, जहां सवाल उठता है—क्या अगली बार भी यही होगा? या हम इस चक्र को तोड़ने के लिए जागरूक और जिम्मेदार बनेंगे?
यह सिर्फ प्रशासन या वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है। क्योंकि अगर आज हम नहीं जागे, तो आने वाले समय में यह आग सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हमारे अस्तित्व को भी चुनौती देगी।






