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मर्माह्र्त व मृत्यु शैया पर पड़े एक शिक्षक की सत्य पीड़ा, कोरोना से हुई मौत।

सुरेश गुप्त ‘ग्वालियरी’ की कलम से, 

 

यह एक झलक है, जो प्रदेश की सुव्यवस्थित रूप से किये जा रहे अव्यस्था की कहानी कह रहा है। अनेक स्थानो पर ऐसी ही कहानी दुहराई जा रही है।

  • मर्माह्र्त व मृत्यु शैया पर पडे एक शिक्षक की सत्य पीड़ा।

झांसी के अंतर्गत आने वाले मऊरानीपुर के संजय गेड़ा जी स्थानीय विद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर थे। कोरोना से ग्रसित हुए। झांसी के रानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहाँ मरीजों के साथ कैसा सुलूक हो रहा है। कितनी देखभाल हो रही है। इसकी बयानी खुद मरने से पहले संजय जी ने वीडियो के मार्फत बताई है। ऐसी मौत जिससे इंसानियत शर्मसार हो जाए। डॉक्टर का पेशा लहूलुहान हो जाए। व्यवस्था सौ गज जमीन के अंदर धँस जाए। रूह कांप जाए। पेट से खून रिस रहा है। भारी दर्द से कराहते हुए संजय जी इंसानियत धर्म निभा रहे हैं। शिक्षक होने का फ़र्ज़ अदा कर रहे हैं। किसी और संजय की असमय मौत न हो इसके लिए अस्पताल की कुव्यवस्था की पोल खुद खोल रहे हैं। ताकि व्यवस्था सुधरे। इंसानो को इंसान समझा जाए

काेरोना से हुई मौत।

उम्मीद है उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को फर्क पड़ेगा। उनके अंदर संत अगर कहीं है तो वह कराहेगा।
निश्चित रूप से योगी ये नहीं चाहेंगे कि ऐसी असमय मौतों के बीच, मौतों के विलाप के बीच, परिजनों के चीत्कार के बीच, हर दिन बेमौत मरती शासन और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच राम मंदिर के लिए घंटे-घड़ियाल बजाने कहा जाए! घी के दीये जलाने कहा जाए!
जिस प्रदेश में राम लला का जन्म हुआ हो, जिस प्रदेश में योगी, संत कहे जाने वाले मुख्यमंत्री हों, इससे अच्छा अवसर क्या आयेगा। ऐसे उत्तर प्रदेश में ही कम से कम रामराज्य की स्थापना कर दो। करके दिखा दो ǃ
अपराधी पुलिस को मौत के नींद सुला रहे हैं। पुलिस अपराधी मिलीभगत से कानून व्यवस्था की मौत हो रही है। जिस डॉक्टर ने मरीजों को बचाने का कसम खाया है उसकी अनुपस्थिति में मरीजों की मौत हो रही है।

क्या ऐसा होगा राम राज्य? क्या योगी, संत के राज में ऐसे राज्य की परिकल्पना की गई थी?  हरगिज नहीं।
तो मुख्यमंत्री जी राज धर्म निभाइये। शासन व्यवस्था बनाइये। कौमे जिंदा रहेंगी, इंसानियत ज़िंदा रहेगी तो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजाघर बनते रहेंगे।

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