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आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र को संविधान की 5 वीं अनुसूची में किया जाए शामिल

आदिवासियों ने वनाधिकार कानून को विफल बनाने की जताई आशंका, शासन-प्रशासन पर लगाया आरोप

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सहकारी कृषि जैसे मुद्दों को हल करने की मांंग

म्योरपुर/पंकज सिंह


वनाधिकार कानून के तहत जंगल की काबिज जमीनों पर मालिकाना हक, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सहकारी कृषि, शुद्ध पेयजल, कोल समेत छूटी हुई आदिवासी जातियों को जनजाति का दर्जा देने जैसे सवालों पर म्योरपुर क्रिकेट मैदान में आदिवासी वनवासी सम्मेलन संपन्न हुआ। आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र को संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल करने का मुद्दा जोरशोर से उठाया गया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी बाहुल्य इस क्षेत्र के पिछड़ेपन की प्रमुख वजह सरकार की उपेक्षा है। खनिज संपदा से भरपूर प्रदेश के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान सोनभद्र का है लेकिन यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक सुविधाओं के लिए बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर है। यहां आदिवासी और वन परंपरागत समुदाय की आजीविका का प्रमुख स्त्रोत जंगल की जमीनों पर जोतकोड और वन संपदा है। लेकिन लंबे संघर्षों के बाद बने वनाधिकार कानून को भी शासन प्रशासन विफल करने में लगा है। एक तरफ सभी आदिवासियों को वनाधिकार कानून में मालिकाना हक दिलाने की वकालत की जा रही है वहीं सत्तारूढ़ दल के विधायक व मंत्रियों द्वारा वन विभाग पर आदिवासी हितों की अनदेखी का आरोप लगाया जा रहा है। दरअसल यह और कुछ नहीं बल्कि आदिवासी समाज को गुमराह करने की कोशिश है। अगर सरकार वास्तव में सभी आदिवासियों को जोतकोड की सभी काबिज जमीनों पर मालिकाना हक दिलाने की इच्छुक हो वनाधिकार की ग्राम समितियों द्वारा जिन दावों की संस्तुति व सत्यापन किया गया है, उन सभी जमीनों पर मालिकाना हक प्रदान करने में कोई अड़चन नहीं है। दरअसल भाजपा कारपोरेट कंपनियों को आदिवासी बाहुल्य इलाकों में जमीनों के अधिग्रहण को सुगम बनाने के लिए वन संरक्षण नियम लाकर वनाधिकार कानून को ही निष्प्रभावी बनाने में लगी है। इसी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी संस्था वाइल्डलाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट याचिका दाखिल कर वनाधिकार कानून को ही खत्म करने की कवायद जारी है। कहा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दावों का पुन: परीक्षण प्रक्रिया शुरू हुई है, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर आदिवासियों समेत वन परंपरागत निवासियों का उत्पीड़न और बेदखली की कार्यवाही की जा रही है। आदिवासियों समेत लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए महिला महाविद्यालय समेत मुकम्मल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने का मुद्दा भी जोरशोर से उठा। मांग की गई कि तत्काल महिला चिकित्सकों समेत स्वास्थ्य व शिक्षा विभाग के सभी रिक्त पदों को भरा जाये। साथ ही गवर्नमेंट ग्रांट के पट्टे पर भौमिक अधिकार दिया जाए. सम्मेलन में आदिवासी वनवासी समुदाय के अलावा बड़ी संख्या में युवा मंच से जुड़े छात्र-छात्राएं भी शरीक हुए।
सम्मेलन का संचालन आदिवासी अध्यक्षता अनवर अली व संचालन आदिवासी वनवासी महासभा के कृपा शंकर पनिका ने की। सम्मेलन को आइपीएफ प्रदेश संगठन महासचिव दिनकर कपूर, युवा मंच प्रदेश संयोजक राजेश सचान, जिला पंचायत सदस्य सुषमा गोंड व जुबेर आलम, युवा मंच जिलाध्यक्ष रूबी सिंह गोंड़, आदिवासी अधिकार मंच के राजेन्द्र ओइमा, मजदूर किसान मंच के जिलाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद गोंड़, साबिर हुसैन, रंजू भारती, देवशाय उरैती, युवा मंच के पंकज गोंड़, राम उजागिर गोंड़, शिव प्रसाद गोंड़, मोहर शाह, राम नरेश गोंड़, मंगरू प्रसाद गोंड़ आदि ने सम्बोधित किया.

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